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Tuesday, September 2, 2008

दास्तान-ए-मुहब्बत

उम्मीद और विश्वास के सहारे,
कदम खुद-ब-खुद बढ़ गये,
तलाश थी जिनकी मजि‌ल पर,
वे किनारे ही मिल गये।
वक्त ने सब कुछ सिखाया
और
उन्होनें बातों से ही रूलाया
बेवफाई का नाम दूँ
या
मुकद्दर इसे कहूँ,
जिस बात पर गुरूर था हमें ,
वे उससे ही मुकर गये,
ये प्यार था
या
धोखा था मेरा,
जो हम भीड़ में उनको ,
अपना समझ बैठे,
इंसान ही तो था मैं
और की ही तरह
धोखे को उनके इजहार समझ बैठे,
बदनाम जो करूँ उनको तो
खुद का भी डर
बस याद न आये वो पल मुझे,
और
न कभी कोई उनकी खबर हो,
जीना तो जीना है
चाहे मर-मर के जियो
या
जी-जी कर मरो।।

7 comments:

नीरज गोस्वामी said...

जीना तो जीना है
चाहे मर-मर के जियो
या
जी-जी कर मरो।।
वाह...बहुत अच्छी रचना...
नीरज

आलोक सिंह "साहिल" said...

बहुत सुंदर रचना.
आलोक सिंह "साहिल"

परमजीत बाली said...

बहुत बेहतरीन रचना है।

उम्मीद और विश्वास के सहारे,
कदम खुद-ब-खुद बढ़ गये,
तलाश थी जिनकी मजि‌ल पर,
वे किनारे ही मिल गये।

Amma said...

दर्द से भरी रचना,अति सुन्दर.

डॉ. श्रीकृष्ण मित्तल said...

जीना तो जीना है
चाहे मर-मर के जियो
या
जी-जी कर मरो।।
बहुत सुंदर रचना.

श्रद्धा जैन said...

bhaut achhi rachna
bahut achha sandesh

संदीप मिश्र said...

mitra aapki kavita padhi, atisundar.