जन संदेश

पढ़े हिन्दी, बढ़े हिन्दी, बोले हिन्दी .......राष्ट्रभाषा हिन्दी को बढ़ावा दें। मीडिया व्यूह पर एक सामूहिक प्रयास हिन्दी उत्थान के लिए। मीडिया व्यूह पर आपका स्वागत है । आपको यहां हिन्दी साहित्य कैसा लगा ? आईये हम साथ मिल हिन्दी को बढ़ाये,,,,,, ? हमें जरूर बतायें- संचालक .. हमारा पता है - neeshooalld@gmail.com

Friday, September 19, 2008

आतंक को करारा जवाब । कुछ खोया और कुछ पाया ,भारत में मुसलमान ही क्यों है हर हादसे के पीछे?

खबर कान में पड़ते ही टी वी पर खबर देखा कि दिल्ली पुलिस ने दिल्ली बम धमाकों के आतंकियों में दो को ढ़ेर कर दिया है और मुठभेड़ जारी है। दिल को तसल्ली हुई। और बम धमाको से पीडित लोगों का दृश्य फिर से आखों के सामने घूम गया।
यह सफलता एक बड़ी सफलता है आतंकवाद के खिलाफ दिल्ली पुलिस की। पर सबसे दुखद बात यह रही कि हमने एक जांबाज आफिसर को खो दिया । पकडे गये दो आतंकवादी पुलिस के लिए अब एक रहस्य मय चाबी की तरह होगें। पुलिस एनकाउट के समय एक आंतकवादी भागने में सफल रहा है । वैसे यह सफलता और अच्छी तब होती जब सभी आतंकी जेल की दीवार में होते । यह एनकाउटर पुलिस पर सवालिया निशान को साफ करने में सहायक साबित होगें । और साथ ही रक्षा मंत्रालय भी कुछ राहत की सांस लेगा।
पुलिस के शहीद हुए मोहन चंद शर्मा के एक छोटी सी गलती ने उन्हें हम सबसे जुदा किया । आखिर एनकाउंटर के समय पर बुलेटप्रूफ जैकेट क्यों नहीं पहनी? क्योंकि यह किसी भी आपरेशन का सामान्य नियम होता है । पुलिस की कुछ लापरवाही के चलते इतनी घेराबंदी होने बाद भी एक आतंकी हाथ से निकल गया । उसने कौन सा रास्ता अपनाया और पुलिस उसे क्यों नहीं पकड़ पायी?
आतंक का मुँहतोड़ जवाब दिया है दिल्ली पुलिस ने । अब आने वाले समय में कोई ऐसी घटना न हो इसके लिए सख्ती से काम करना होगा । क्योंकि राष्ट्रीय राजधानी में अगर एसी वारदात हो सकती है तो भारत के किसी और जगह की दशा और खराब है।
एनकाउटर सही या गलत इस पर मीडिया का सवाल शुरू हो रहा था । हर चैनल अपना सवाल लिये खड़ा था ? पर पुलिस के मोहन शर्मा के शहीद होते ही सब सवाल समाप्त होगये। मीडिया के ऐसे रैवये पहली बार नहीं है पर यहां पर मीडिया की कोशिश व्यावसायी करण कि नहीं होनी चाहिए क्योंकि यह मामला राष्ट्र से जुड़ा हुआ है।
सभी आतंकी युवा है और ये हमारे भारत के भविष्य होने चाहिए थे ,पर क्यों इनके हाथों में मौत का सामान है? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? गांवो के युवा क्यों साथ देते हैं आतंक का जबकि पता है इन्हें अंजाम खुद भी। नाम इस्लाम का और काम कसाई जैसा । बदनाम करते है कौम को अपनी । चर्चा होती मुसलमान के नाम पर ? आखिर क्यों मुसलमान ही होता है हर हादसे के पीछे? भारत के धर्मनिरपेक्षता पर एक अहम सवाल खड़ा करता है। हमसब भाई है पर ये हादसे क्यों?

3 comments:

Ashok Kumar Dixit said...

Sahin likha hain aapne par ye pura nahin hain isme or likhne ki jarurat hain aapka title itna achha hain par uske hisab se lekh nahin hain ismen ise or puara karne ki kosis kijiye or pura dhyan aapka title ke upar hi hona chahiye or isme ek jagah encounter sahin se nahin likha hua hain

Umesh said...

"कुरान" से प्रेरित हो लोग आतंकी बन रहे है। ईस पुस्तक पर प्रतिबन्ध लगना चाहिए।

rakhshanda said...

आपका लेख अच्छा था, पढ़ा और आपकी तारीफ़ भी करनी चाही...लेकिन ऊपर दिए गए कमेन्ट ने कुछ कहने ही नही दिया, ये है रवय्या आपका किसी मज़हब के प्रति....क्या अब भी बताने की ज़रूरत है की भोले भाले लोग ऐसे दलदल में क्यों फँस रहे हैं...शर्म आती है ये सोचकर की जब पढ़े लिखे जिम्मेदार लोगों का ये रवैय्या है तो जाहिल समाज का क्या होगा...बहुत दुःख हुआ आपके ब्लॉग पर आकर...