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Friday, September 19, 2008

भारत में बेटियों की संख्या में कमी हो रही है और नारा लग रहा है"बेटी बचाओ" पर कैसे?


यदि स्त्री न हो तब दुनिया कैसी होगी? यह सवाल हम उन आकड़ों के देखते हुए कर सकते हैं , जो हाल ही के सर्वेक्षणों से निकल कर आये हैं। यह संदेश आप को सरकारी और गैरसरकारी संस्थानों द्वारा पहुँचाया जा रहा है पर भारतीयों के कान में जूँ तक नहीं रेंगी? हमारे सामने-भ्रूण हत्या,दहेज दहन या स्त्री हत्या को विभिन्न स्त्री दोषों से जोड़कर अंजाम दिया जाता है।
हमारे यहां लड़की को बोझ समझा जाता है , बच्ची गरीब हो या अमीर वह एक बोझ , परायी अमानत कीतरह पिता के घर पलती है। कुदरत की दी हुई लड़की स्त्री-पुरूष के क्रोमोजोम के मिलन का परिणाम है, जिस पर हमारे देश वासियों का कोई बस नहीं है। अब आलम यह है कि परिवार में भले आसामान्य बेटा हो जाए, लेकिन सामान्य स्वस्थ्य लड़की नहीं चाहिए। वैसे इन बातों के सच को हम सभी जानते हैं।लेकिन नहीं जानना चाहते उस सूत्र को, जिससे लड़की को मनुष्य के रूप में इतना हेय माना गया हैकि उसका जीना बर्दास्त के बाहर है।
यह गजब की नफरत ही उस पर तब से कहर बनकर टूटने लगती है, जबकि वह गर्भ में हाथ पांव तक नहीं हिला सकती है। और औरत बनते ही मर्द के आकर्षण का केन्द्र बन जाती है। जिन प्रदेशों में औरतों कि संख्या कम है उन्हें औरतें चाहिए। वे सेवा के लिए , श्रम और सेक्स के लिए,वंश चलाने के लिए या बेटे पैदा करने के लिए। ऐसे में औरतों के खरीद फरोख्त के बिना समाज नहीं रह सकता है। यदि कन्या वध ऐसे ही जारी रहा तो औरतें सोने के भाव बिकेगीं।और भारतीय माता-पिता बेटियों को जन्म देगें।
रूढिवादी परम्पराओं के तले हम "बेटी बचाओ" का नारा किसके लिए लगा रहें हैं? बेटी हमारी ताकत है, लेकिन संपत्ति का अधिकार न देकर हम किस सशक्तिकरण की बात कर रहें हैं? बेटियों को मारने का ग्राफ ऊपर ही जा रहा है। इसमें कोई परिवर्तन तब तक कारगर नहीं होगा , जब तक वह सहज रूप से व्यवहार में न आये। पहले हम अपने व्यवहार को बदले। और अपनी मानसिकता को आजाद करेंऔर बेटी को सही नजरिये से देखें , बराबरी का दर्जा दें तब समाज में कुछ असमान्य उथल पुथल हो सकता है । वरना सब वैसे ही चलता रहेगा और नारे लगते रहेगें।

5 comments:

Vinesh Saxena family foundation said...
This comment has been removed by the author.
Vinesh Saxena family foundation said...
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Vinesh Saxena family foundation said...

This scoiety is always man dominating. Before man were getting dowry so eberybody wanted son. Now the condition is that man have to pay dowry because there are less girls & if they want to get married.



Why this Nare bajee, pahle larkee wala de raha tha ab Dahej deejeeye aur apne larke kee marriage keejeeye.

"WHY GIRLS OR LADIES ALWAYS HAVE TO BE SEEN WEAKER IN SCOIETY ?

I will say before it was ploy gamy now "LET THE SCOIETY TOLRATE POLY ANDRY" Like Dropetee

I already predicted this will happen in late 70's . Because everybody wanted 2 larke 1 larkee,so there was 100% chance of creating of imbalance in man & women retio.

Dahej pratha ab ultee chalegee. Larkee wala dahej payega kyonki everybody will like to have son who is consider to be continuer of generation.

Continuer of generation larka hee rahega kyonkee uske pas more muscular energy hai and it is easy to be in a home for the old & weak parents if they are relative of the stronger person.

That is why in our culture it is said betee ke ghar naheen rahate hai. kyonkee wahan jo saga hai woh kamjor hai. "BETEE KA HUSBAND HAS MORE MUSCULAR POWER" So it can effect betees family life.

संगीता पुरी said...

सही कहा आपने। सब वैसे ही चलता रहेगा और नारे लगते रहेगें। बेटियों को बचाने के लिए मांओ को आगे आना पड़ेगा।

Udan Tashtari said...

सही कह रहे हैं:

सब वैसे ही चलता रहेगा और नारे लगते रहेगें।