जन संदेश

पढ़े हिन्दी, बढ़े हिन्दी, बोले हिन्दी .......राष्ट्रभाषा हिन्दी को बढ़ावा दें। मीडिया व्यूह पर एक सामूहिक प्रयास हिन्दी उत्थान के लिए। मीडिया व्यूह पर आपका स्वागत है । आपको यहां हिन्दी साहित्य कैसा लगा ? आईये हम साथ मिल हिन्दी को बढ़ाये,,,,,, ? हमें जरूर बतायें- संचालक .. हमारा पता है - neeshooalld@gmail.com

Monday, October 13, 2008

मेरा काव्य - " ये पल "


खुशियों का ये पल,
यूं ही गुजार दे,
इतना तुमको प्यार दें,

जाने क्या होगा कल ,
कैसे होगें आने वाले पल
जी ले इनको जी भरके ,
गम का न साया हो
खुशियों की छाया हो
चले साथ ये हवायें
ऐसा लगै जैसे कि
बिन बुलाये कोई आया हो,
हम तुम हो केवल
और
हो बातें अपनी
सोचें क्या - क्या हम तुम ,
बीते यूँ रातें अपनी ।
खुशियों का ये पल
यूँ ही गुजार दे।

7 comments:

फ़िरदौस ख़ान said...

खुशियों का ये पल,
यूं ही गुजार दे,
इतना तुमको प्यार दें,

बहुत अच्छी रचना है...

विनय said...

आप भावना की क़द्र करता हूँ!

श्रीकांत पाराशर said...

Achhi prastuti hai.

रश्मि प्रभा said...

खुशियों की छाया हो
चले साथ ये हवायें
ऐसा लगै जैसे कि
बिन बुलाये कोई आया हो,......waah !

Deepak Bhanre said...

जाने क्या होगा कल ,
कैसे होगें आने वाले पल
जी ले इनको जी भरके ,
गम का न साया हो
खुशियों की छाया हो

बहुत ही सुंदर . बधाई .

mehek said...

खुशियों की छाया हो
चले साथ ये हवायें
ऐसा लगै जैसे कि
बिन बुलाये कोई आया हो
wah bahut khub

रंजना said...

waaaaaah..बहुत ही सुंदर . बधाई