जन संदेश

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Monday, October 6, 2008

मेरा काव्य - " सिगरेट "


जलता है खुद
दूसरों के लिए
करता है
समपर्ण अपना
निःस्वार्थ,

घटता है
तड़पता है
आखिरी दम तक
फिर भी
हारना नहीं जानता
मौत से अपनी,

पाता है
विजय
खुद पर
दूसरों से,
क्योंकि
मालूम है उसे
हस्ती अपनी
जलना है
इसलिए
जलता है ।

7 comments:

makrand said...

पाता है
विजय
खुद पर
दूसरों से,
क्योंकि
मालूम है उसे
हस्ती अपनी
जलना है
इसलिए
जलता है

good lines
regards
do visit my blog
congrates me i was the to comment
makrand-bhagwat.blogspot.com

Alag saa said...

खा रखी होती है कसम पीने वाले को मिटा देने की,
पता नहीं किस जन्म की दुश्मनी निभा रहा होता है ये।

नीरज गोस्वामी said...

नीशू जी...बहुत अच्छी रचना है आप की...विषय और भाव दोनों एक दम नए...बधाई...
नीरज

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुन्दर कविता, मान गये आप ने सिगरेट पर भी ......
धन्यवाद

Udan Tashtari said...

क्या बात है..बहुत सही.

rakhshanda said...

पाता है
विजय
खुद पर
दूसरों से,
क्योंकि
मालूम है उसे
हस्ती अपनी
जलना है
इसलिए
जलता है
बहुत खूब नीशू...इतनी सादगी से बहुत बड़ी बात कह दी आपने...थैंक्स

मनुज मेहता said...

bahut achi kavy rachna, bahut goodh shabdon ka chyan, fine rythem.
good work