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Sunday, October 5, 2008

दहेज प्रथा सामाजिक बुराई पर युवाओं का बदलता नजारिया क्या कम कर सकेगा इस बुराई को ? ब्लागर समूह क्या सोचता है ?


यूँ मैं कुछ न कुछ लिखता हूँ रोज ही । कभी राह चलते कुछ दिख जाता है जो कि बहुत दुखद होता या फिर कुछ अजीब होता या फिर किसी सामाजिक सरोकार से जुड़ा होता है या फिर हास्य होता है। अब लिखना जैसे मेरी जरूरत ही बन गयी है, आदत बन गयी है ।
आज चाय की दुकान पर चाय वाले से ही बहुत सी हो रही थी । सामाजिक मुद्दो पर तो बीच में बात से बात निकलती गयी और समाज में दहेज प्रथा तक आ पहुँची। मुझे भी अच्छा लग रहा था चाय वाले अंकल से बात करते हुए । उन्होंने कऐ अच्छे तर्क भी दिये जो कि लाजवाब थे। उनका जीवन अनुभव भी बहुत पसंद आया हुझे। वैसे वो बोले कि चाय मेरा पेशा नहीं मजबूरी है । पर चलिये मुद्दे पर आते हैं ।
समाज में दहेज बहुत ही विकराल स्वरूप धारण कर चुका है । लोगों को अपने स्तर पर दहेज के रूप में अनेक चीजें भाती है जैसे - मोटर , गाड़ी और एक मोटी रकम । छोटी चीजें जो दैनिक जीवन की है आप तो उनसे वाकिफ ही है । उसे क्या बताना । लड़कियां कम हो रही है ऐसा आकड़े कहते पर दूसरी ओर दहेज का फैलता दायरा मां बाप के लिए बेदह समस्या का विषय बना हुआ है । आजकल का जो ट्रेंड है वह यही की लड़का यदि इंजीनियर या डाक्टर है तो कैश के रूप में लड़की वालों को २५ लाख का एक छोटा सा दान करना है और कुछ ज्यादा नहीं बाकी तो शादी में देखा जायेगा । हां कहीं आप किसी प्रशासनिक अधिकारी से अपने लड़की की शादी की बात सोच रहें है तो फिर डिमांण्ड कुछ भी हो सकती है । आप इसके लिए तैयार रहें ।और अगर बेरोजगार लड़के के तलाश में है तो हो सकता हे कि से लाख में आप लिपट सकते है । कुछ ऐसी बोली लग रही है ब्याह बाजार में। जैसी औकात हो वैसी ही मण्डी में आप जा सकते हैं। ये रही मोल भाव की बात कि आप कितने में सौदा तय कर सकते है यह आपके ऊपर भी निर्भर करता है।
दहेज़ का बढ़ता हुआ जाल आज किसी भी परिवार के लिए चिन्ता का विषय है । इसका उपचार कहीं दिखता हुआ नजर नहीं आता है ।पहले तो शायद यह कहा जाता रहा होगा कि शायद अभी लोग कम जागरूक है इसलिए दहेज लिया जाता है और जब शिक्षत लोग समाज में ज्यादा होगें तब यह प्रथा समाप्त हो जायेगी । पर हुआ एकदम उल्टा पढ़ लिखे लोगों के लिए दहेज एक स्टैण्डर्ड तय करता है । लोगों कि सोच में दहेज एक अच्छा माध्यम बन गया है अमीर बनने का । हमारे समाज में प्यार करना भी गुनाह है तो भला प्यार के बाद शादी को कैसे स्वीकर किया जा सकता है ? हाल की घटना (ग्रेटर नोएडा) से हम रू-ब-रू है जहां पर प्रेमी युगल को जिंदा जला दिया गया। मेरे अनुसार यदि युवा पहल करें तो सम्भव है कि कुछ हद तक दहेज में कंी आ सकती है।
दहेज प्रथा का विरोध मेरे भैया द्वारा कुछ इस तरह-

(नाम - पंकज तिवारी ,व्यवसाय-टीसीएस में साफ्टवेयर इंजीनियर उम्र- २७ साल , स्थान- मुम्बई)


दहेज के प्रति हम जो भी बोलते है वह कभी करते नहीं ।ऐसा होता है । पर मेरे भैया ने एक ऐसा ही उदाहरण दिया जो मेरे सामने पहला है । शादी के लिए उनका साफ तौर पर यह कहना है कि " मैं दहेज को समाज की बुराई के रूप में देखता हूँ , और इसे रोकने के लिए मैं खुद तो दहेज नहीं लूगा। बहुत लोगों ने विरोध किया । घर में , नातेदार रिश्तेदार और साथ ही मेरे पिता जी ने भी "। पर भैया अपने फैसले पर आज भी अडिग है । और गत २२ नवम्बर को शादी होगी। जो कि मुझे बहुत ही अच्छा लगा।
हमारे कोई बहन नहीं है इसलिए हम दोनें भाईयों ने यह बात सोची है कि हमें कोई मजबूर नहीं कर सकता दहेज के लिए । आइये आप सभी इस सामाजिक बुराई को खत्म करने का प्रयास करें।

4 comments:

Nitish Raj said...

सही सोच है, साथ ही युवाओं को आगे आना होगा और लड़कियां भी साफ मना करना का मादा रखें कि हां यदि मांगता है दहेज तो जा नहीं करना शादी तेरे से। आपके भाई की पहल अच्छी है। जब मैंने अपने घर में ये बात रखी थी तो मेरे घरवालों ने खूब लताड़ा था। सारी बिरादरी में मेरी थू थू हो रही थी। पर मैंने ठान रखी थी। बात की होने वाली पत्नी से और कर ली मंदिर में शादी। मेरी पत्नी ने भी मेरा पूरा सहयोग दिया। लेकिन दहेज नहीं लिया। हमारे घर में बातचीत बंद है पर ये किस्सा कभी और।

सूत्रधार said...

aap ko apne bhai kii shaadi ki badhaii , apney samay mae bhi yaad rakhey aur adig rahey
issii tarah ki post ko pachaas pratishat par bhi likhey

अविनाश वाचस्पति said...

कदम तो दमदार है
जमाने को इंतजार है
दहेज लेने वाले भी हैं
देने वाले भी हैं जिन्‍होंने
गर्क कर रखा है बेड़ा।

पर ऐसे मजबूत
दमदार कदमों पर ही
बदलाव की आंधी
बनती हैं अंधड़
उसी अंधड़ का इंतजार है
जब दहेज को हेय
नजर से सिर्फ देखा ही
नहीं जायेगा, अमली
जामा भी पहनाया जायेगा।

एक आगे आया है
कल नीशू आयेगा
और इसी तरह
कदम दर कदम
यह खूबसूरत कारवां
आगे बढ़कर अपनी
मंजिल पायेगा।

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया सोच है, बधाई!!