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Wednesday, October 15, 2008

मेरा काव्य - " चौराहे पर जिंदगी उसकी "


चौराहे पर हंसती है जिंदगी,
एक बच्चे की ,
हाथों में रोटी का टुकड़ा ,
तन पर कुछ गंदे कपड़े,
और
आसपास मक्खियों का झुण्ड ,
आते जाते लोगों को देखते
ढ़लती है शाम ,
कुछ ऐसे ही चलती है
जिंदगी ,

आखों में खुशी,
मन में विश्वास ,
कुछ आगे बढ़ने का
जज्बा,
शायद यही सब है
उसके पास ,
एक छोटे से टुकड़े पर
उसकी दुकान ,
जिस पर है कुछ ही
समान ,
क्या करता होगा
कुछ कमायी ?
पर
इसी ने जिंदगी चलायी ।
मैं देखता हूँ
बड़े गौर से बच्चे को ,
उसका खिलखिलाता चेहरा ,
आस-पास कुछ कंकड़
जो खिलौने है उसके ,
और उसके मटियाये
बाल को,
और
गंदे शरीर को ,
फिर सोचता हूँ
बचपन को ,
कितना फर्क है ?
दुख होता है मुझे ,
पर
फिर भी वह खुश है
इस जिंदगी से ।

5 comments:

जितेन्द़ भगत said...

सुंदर भावाभि‍व्‍यक्‍ति‍-
मैं देखता हूँ
बड़े गौर से बच्चे को ,
उसका खिलखिलाता चेहरा ,
आस-पास कुछ कंकड़
जो खिलौने है उसके ,
और उसके मटियाये
बाल को,
और
गंदे शरीर को ,
फिर सोचता हूँ
बचपन को ,
कितना फर्क है ?
दुख होता है मुझे ,
पर
फिर भी वह खुश है
इस जिंदगी से ।

Akshaya-mann said...

bahut kadwa sach aur is sach ko humain sochte hue bhi sahem jate par wo jo ise baar baar jite pata nahi kaise sari ichaaye saari kamnaye mar jati
aapki ye rachna pad mujhe apni ek rachna yaad aa gai
विकलांग बचपन की वंदना
सपनो में डूबी आँखों में वो बचपन याद आता है मुझको

दिल में डूबी उन यादों का दर्पण याद आता है मुझको

हर किसी के दिल में अपने बचपन की याद समाई होती है

जीवन की रहस्यमई पहेली में बचपन को दोबारा जीने की आस छुपी दिखाई देती है मुझको

बचपन के रिश्ते बड़े होने पर कुछ और ही दिखाई देते हैं

ज़िन्दगी की हर कसौटी पर परखे जाने के बाद भी कमजोर दिखाई देते हैं

:> ऐसा भी बचपन है जो कभी दिखाई नहीं देता

एक ऐसा भी बचपन है जो कभी अंगडाई नहीं लेता

एक ऐसा भी बचपन है जो प्यार के लिए तरसता है

एक ऐसा भी बचपन है जो उम्मीद के सहारे जीता है

क्यूंकि

उसका बचपन उलझा हुआ है ज़िन्दगी की पहेली सुलझाने में

क्यूंकि

उसका बचपन झुलसा हुआ है हवस की आग में

क्यूंकि

उसका बचपन सिमटा हुआ है फुटपाथ के अंधेरो में

क्यूंकि

उसका बचपन लिपटा हुआ है अपने अनसुलझे सवालो में

इस बचपन को दोबारा बचपन जीने की कोई आस नहीं

इस बचपन को उन रिश्तो से कोई मतलब नहीं

जो हर बार किसी न किसी कसौटी पर परखे जाते हैं

और जरा सी नज़र अंदाजी पर तोड़ भी दिए जाते हैं

फ़िरदौस ख़ान said...

आखों में खुशी,
मन में विश्वास ,
कुछ आगे बढ़ने का
जज्बा,
शायद यही सब है
उसके पास ,
एक छोटे से टुकड़े पर
उसकी दुकान ,
जिस पर है कुछ ही
समान ,
क्या करता होगा
कुछ कमायी ?

सुंदर भावाभि‍व्‍यक्‍ति‍...

रंजन said...

खुब..

रंजना said...

मार्मिक पर बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति है ,मन को छू गई.