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Tuesday, October 7, 2008

मौत

लगाना चाहता हूँ गले
ये मौत तुझे
आओ कभी बिन बताये
भर लो आगोश में
अपने मुझे,
अब और नहीं
चाहता रहना इस जहां में
न कोई ख्वाहिश रही
न कोई चाहत रही
अब तो बस
इंतजार है तेरा
मिल जाऊ तुझमें ही
इस जहां से अलग
हो जाये खत्म
नामों - निशां मेरा ,
होती है घुटन खुद
आप ही
आओ कभी तुम
चुपचाप ही
और
चलूँ मैं
साथ तेरे ।

4 comments:

seema gupta said...

लगाना चाहता हूँ गले
ये मौत तुझे
आओ कभी बिन बताये
भर लो आगोश में
अपने मुझे,
अब और नहीं
चाहता रहना इस जहां में
" abhee se itnee nerasha kyun?????'

regards

रंजन said...

ना बुलाओ भाई,

reverse gear नहीं है इस गाडी़ में

राज भाटिय़ा said...

अभी नही जब खुद चिपटे गी तो मजबुरी है, लकेन अभि तो इसे दुर भगाना चाहता हुं
सुन्दर लेकिन बडी भायनक सुन्दर कविता.
धन्यवाद

jitendra said...

बहूत बढिया लिखा हैा