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Saturday, October 11, 2008

मेरा काव्य - " आज तुम फिर देर से आयी हो "


आज तुम फिर देर से
आयी हो
बुलाने पर मेरे
करती हो वादा
यूँ
हरदम ही आने का
पर
आदत है तुमको
देर से आने की
वक्त का एक-एक लम्हा
सताता है मुझे
झांकता हूँ
बार-बार गली को
देखता हूँ तुम्हारी राह
कि शायद तुम आ रही हो,
सोचता हूँ तुमको
देखता हूँ तुमको
चाहता हूँ तुमको
हरपल ही
जानता हूँ आओगी तुम
पर
देर से ही
ये दिल है कि
बेकरार रहता है
तुम्हारे लिए।
देर से आओगी
तो करूंगा शिकायत
तुमसे ही
और तुम फिर हंस दोगी
मुस्कुराकर
मैं फिर से
हो जाऊंगा लाचार
हमेशा की तरह ।
क्योंकि मुझे
अच्छा लगता है
यूँ
मुस्कुराना तुम्हारा
शिकायत तो एक बहाना है मेरा
तुम्हें हंसाने का ।

6 comments:

Akshaya-mann said...

bahut sundar

komal bhavnaaon main dubi ek khunsurat rachna ....
yahi hota pyar kuch log ise samajhne main galti kar dete hain.......
shikayat ko kuch aur hi samajh lete hain bahut accha likha hai......
pyar ka yahi roop hai......

Advocate Rashmi saurana said...

चिन्ता मत करिये वो जरुर आयेगी. बहुत सुन्दर रचना. लिखते रहे.

शोभा said...

वाह! बहुत सुंदर लिखा है

सतीश सक्सेना said...

बहुत खूब !

मनुज मेहता said...

बार-बार गली को
देखता हूँ तुम्हारी राह
कि शायद तुम आ रही हो,
सोचता हूँ तुमको
देखता हूँ तुमको
चाहता हूँ तुमको
हरपल ही
जानता हूँ आओगी तुम
पर
देर से ही


komal bhav hain, prstuti aur acchi ho sakti thi, apne bhavon ko shabdon ke saath udne dijiye. mujhe kahin kahin laga ki aapke shabd thoda bandhan mehsoos kar rahe hain, let them fly on their own. keep writing, i like to read your work.
regards
Manuj Mehta

makrand said...

बड़ा अच्छा संकलन
आपके पेज का
बधाई