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Monday, October 6, 2008

मेरा काव्य- "मेरे कमरे की खिड़की से "


मेरे कमरे की खिड़की
से
झाकती है रोशनी
प्रकाशमय करती है
मेरे जीवन को
हर रोज,

आती है चुपके से
बिना आहट दिये
दस्तक देती है
मेरी चौखट पर,

खुलती है आखें
उजली किरण के साथ
चका-चौंध
दुनिया में
मिलता है
इसका साथ
उठता हूँ
देखता हूँ
नित्य ही
उस खिड़की से
बाहर,

एक खामोश ,
सुहानी सुबह को
चिड़ियों की
चह चहाहट को
आते जाते
लोगों को,
शुकून मिलता है
ताजगी मिलती है,
ठंड हवा के
झोंकों से,
होती है
दिन की शुरूआत
कुछ ऐसे ही।

3 comments:

अविनाश वाचस्पति said...

सुंदर काव्‍य अभिव्‍यक्ति।

चित्र भी
अपनी खिड़की से
लिया होता।
तो सच्‍चा आनंद
छा जाता।

seema gupta said...

एक खामोश ,
सुहानी सुबह को
चिड़ियों की
चह चहाहट को
आते जाते
लोगों को,
शुकून मिलता है
ताजगी मिलती है,
ठंड हवा के
झोंकों से,
होती है
दिन की शुरूआत
कुछ ऐसे ही।
'very good poetry and wish kee apke hr subeh aise hee tajgee se bhree ho'

regards

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया!!