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Wednesday, October 15, 2008

मेरा काव्य - " तुम्हारी यादें "


आज आखें छलक आयी,
जब याद तेरी आयी
बैठा अकेला मैं
दूर दुनिया से,
बीती बातें कुछ उभर आयी
तुम दूर हो मुझे
मालूम है
फिर भी दिल ने
आने की तेरे
आहट पायी ।
अच्छा हूँ मैं
अधूरा ही सही
अब ख्वाबों में भी है
तन्हाई,
सब कुछ पाया मैंने
एक सिवा तेरे,
अब चाहत थी कि
भूल जाऊं तुमको,
पर
कोशिश न मेरी रंग लायी ।
करता हूँ सवाल
खुद से मैं,
ये जिंदगी क्यूं
गम लायी ।

5 comments:

अविनाश वाचस्पति said...

मग भर गम
गम ना कर
हों सितम
गम न कर
हों गम तो
गम न कर
सिर्फ दम भर।

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा!!!

mahashakti said...

bahut achchhe neeshoo ji

योगेन्द्र मौदगिल said...

एक शेर आपकी नज्र करता हूं
कि

थोड़ा-थोड़ा कहना अच्छा
थोड़ा मन में रहना अच्छा

Rita said...

dard-e-dil ki bayaani mei
dil ka dard chalak jaata hai
yaadon ka kaarwaan besabab
aankhen bhar bhar laata hai