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Sunday, March 8, 2009

बदलना होगा मुझको - एक गजल

मैं, मुझे पसंद नहीं मुझको बदलना होगा।
वक़्त तेज चलता है साथ ही चलना होगा।।

ना तो सीखा ना सिखाया गर्दिशों में झुक जाना,
आँख मूँद, सिर झुकाके अब तो गुज़रना होगा।।

एक चेहरा काफी नहीं गौर से सुन नासमझ,
चार-छः मुखौटे भी साथ में रखना होगा।।

अलग नज़र अलग सोच छोड़ दे तू फौरन,
भीड़ का हिस्सा बनके भीड़ में चलना होगा।।

बहुत हसीं दुनिया है सब तो यही कहते हैं,
बेवजह तू चीख रहा इसको बदलना होगा।।



प्रस्तुति - पंकज तिवारी

5 comments:

mehek said...

bahut badhiya gazal,khas kar aakhari do sher bahut pasand aaye.badhai

अशोक कुमार पाण्डेय said...

अच्छी भावनाये है…

पर दुनिया इतनी अच्छी भी नही है कि इसे बदलने की ज़रूरत समाप्त हो गयी है।

नीरज गोस्वामी said...

बहुत खूब कहा है...वाह..
आपको होली की शुभकामनाएं.
नीरज

vinodbissa said...

VAH ..... BAHUT SHANDAR PRASTUTI HAI .... PANKAJ JI SHUBHKAMANAYEN.....

surabhi said...

बहुत सुन्दर लिखा है आपने
प्रयास जारी रखिये गा