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Wednesday, March 4, 2009

गांधी जी बिक रहे हैं....................चलो ले आते हैं


कभी कोई आधा खाया केला नीलाम होता है, तो कभी कोई चुइंगम। ऐसे आश्चर्य देखने और सुनने को मिलते रहते हैं। कहीं से खबर आयी की गांधीजी नीलाम हो रहें। पर यह कैसे हो सकता है? वो हैं ही नहीं तो उनकी नीलामी कैसे? फिर दिमाग पर जोर डाला तो सोचा शायद विचारों की बोली लग रही हो? जो चाहे इस बोली में अपने मन पसंद से बोली लगाकर गांधीवादी बोली खरीद सकता है। खबर अच्छी थी और अच्छी लगी, कमसे कम अब उन तुच्छ लोगों काभला कुछ समय के लिए जरूर हो जायेगा । जो अच्छे बनने का दिखावा करते हैं। ऐसे विचारों का मोल अनमोल हो जायेगा। पर अब जबकि विचार ही नहीं पनपते तो विचारधारा का क्या ?पहचान के मायने नोटों का वो बंडल है जिसके पीछे सभी भागते हैं , आजीवन।


बोली का दिन समय और स्थान तय हुआ । एक से बढ़कर एक हैवान,शैतान,और इंसानकी जमात शामिल है इस बाजार में । एक दूसरे पर चढ़बैठ रहें कि कहीं कोई बात छूट न जाये लेनें में। कोई विचारनिकल न जाये सामने से।धीरे-धीरे, मानवता,इंसानियत, प्रेम,भाईचारा,मददसभी कुछबिकता है जोरोंशोरों से ,जो जितना आगे है लपक कर ले रहा है । जो बोली ज्यादा लगा रहें है उनके चेहरे खिले हुए है, प्रसन्ता का असर में धक्कामुक्की में दिख रहा है ।उत्पात की झड़ी लगी है ।रेलमपेल मचा है। । अब बारी आती है उन कुछ टूटे फूटेसमानों की( जिसका आकलन करना किसी व्यक्ति के लिए आसान नहीं) तो सब अपना-अपना रास्ता तय करते हैं। कोई उत्साह नहीं । इन फटे पुराने से अच्छा तो नामचीनी औरब्रांड के कपडे और सामान सस्ते में मिल जायेंगें । इनका क्या करेंगें भला?जैसे तैसे बाजार बंद होती है आम इंसान सिवाय देखने और सुनने के अलावा कुछ भी न पाता है ।

वह तो सब बातें सुनता है और अपने में ढालता है। और खुशी-खुशी लौटता है । कुछ न मिला तो क्या ? गांधीजी तो मिल गये ना।वो भी बिना कुछ दिये हुए,पर देने को क्या था ही ? सिवाय दुख के।

3 comments:

अंशुमाली रस्तोगी said...

चीजों की नीलामी से कोई फर्क नहीं पड़ता बस विचार नीलाम नहीं होने चाहिए।

Mired Mirage said...

आज तो चश्मा आदि नीलाम हो रहा है परन्तु गाँधी जी के नाम को तो लोग कब से ही बेच खा रहे हैं।
घुघूती बासूती

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

गांधी जी को बेचकर लोग सत्ता पा गये.