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Monday, March 23, 2009

अब कुछ ऐसी है अपनी लाइफ


दिल्ली की लाइफ भी अन्य मेट्रो सिटी जैसी ही है , इंसान भागमभाग में हैरान परेशान है , हाल बेहाल है फिर भी दौड़ भाग नियमित है अरे भई भागना ही है तो किसी प्रतियोगिता में भाग लो तो कुछ परिणाम भी आये यहां तो बस लगे रहो " इण्डिया का नारा " है । फुरसत नहीं सांस लेने की कहते हैं बहुत से लोग तो फिर भई जिंदा भी नहीं होगे मतलब कि भूत जैसे तो कुछ नहीं । वैसे भी कहां रही आज मानवता । शायद कभी रही होगी । इंसान क्या हकीकत में इंसान है ? शक की सुई घूमती है इस प्रश्न पर जेहन में।

जब विश्वास खत्म होता है सब नाते रिश्ते , भाईचारा , प्यार सभी कुछ खत्म हो गया है , विकास में इंसान भी विकास ही कर रहा है मानव से मशीन बन गया है तो विकास ही तो हुआ न । पैसा आज ही नहीं हमेशा से जीवन के लिए आवश्यक रहा पर एक बात कि सब कुछ नहीं रहा है । हमारे विचार , हमारी सोच और हमारे जीवन जीने का ढ़ग एक रास्ता तय करता है भविष्य का पर आज की पालिशी हम सबको पता है । विश्वास का आता पता नहीं , प्रेम क्या है शायद किसी का नाम और रिश्ते वो तो मोबाइल नें जब्त कर लिये हैं । सुविधायें बनी है आराम मिला आराम हराम हो गया कब पता भी नहीं चला । खुदगर्ज होना स्वार्थी होना , चापलूसी करना ये सब आज के नये तरीके है आगे बढ़ने के।
सफलता का मापक है कमायी यानी पैसा तो ठीक है भईया करिये कमायी वो पता नहीं कहा कहां से आयी । सब समझना और फिर सब समझते हुए भी न समझना ही समझना है । देखिये सब पर ऐसा लगे कि आपने कुछ नहीं देखा आंखे है पर वही देखने के लिये जो आपको दिखाया जाय। चलो अच्छा कुछ नया नहीं करना होगा जियों ऐसे ही वैसे भी जी क्या रहे हो बस जीने का दिखावा ही है । कहते है कि बोलिये पर किसी को सुनाई न दे । सही भी है सुनना कौन चाहता ही है ।

4 comments:

अनिल कान्त : said...

दिल में जो चल रहा था ...आपने सब उधेल दिया ...अच्छा लगा

संगीता पुरी said...

महत्‍वाकांक्षा तो ठीक है ... पर आज आगे बढने के लिए जो तरीके बन गए हैं ... वे बहुत गडबड हैं।

Mired Mirage said...

जीवन कठिन भी हो गया है और मैकेनिकल भी। परन्तु फिर भी ढूँढने से मानवता मिल जाती है यहाँ वहाँ मुस्काती हुई।
घुघूती बासूती

आलोक सिंह said...

नीशू जी देल्ली की लाइफ का क्या कहना , बस एक दौड़ है चारो और पैसे पाने के लिए , लोगों को अपनी फ़िक्र नहीं है तो दूसरो की क्या करेगे .