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Sunday, March 15, 2009

मीडिया को न्यूज दिखाना चाहिए या फिर व्यूज ???????????

मीडिया का कार्य क्षेत्र क्या है? मीडिया को न्यूज देना चाहिए या फिर व्यूज ( विचार ) ? इस पर हमेशा से ही सवाल उठता रहा है । वैसे मीडिया का प्रमुख कार्य तो न्यूज ही है परन्तु न्यूज का प्रभाव क्या क्या हो सकता है यह मीडिया बिल्कुल भी नहीं सोचती है । आज बाजारवाद का बढ़ता प्रभाव मीडिया को भी अपनी गिरफ्त में ले चुका है , तो ऐसे बाजार को ध्यान में रखते हुए मीडिया ने अपने कार्य तय किये । परन्तु कुछ विषय ऐसे है जिनकी जरूरत न होते हुए भी मीडिया उसे परोसती है । आखिर करे क्यों न भई पेट जो भरना है । और खोजी पत्रकारिता इसी की देन कही जा सकती है जिसने कई सही और गलत रहस्यों पर से पर्दा उठाया है ।

वर्तमान परिदृश्य में यदि देखें तो आज मीडिया में न्यूज की कमी बखूबी दिखती है । खबर वही बनती है जो बिक सके । एक छोटी सी बात को खींच तान के इतना बढ़ाया जाता है कि खबर अपना मूल रूप खो कुछ नया रूप धारण कर लेती है जिसके मायने ही बदल जाते हैं । इससे सामाजिक स्वरूप पर बेहद गंदा अदर पड़ता है । लेकिन मजबूरी आज भी यही है कि मीडिया पर किसी तरह की कोई रोक नहीं है और न ही कोई ऐसी संस्था ही है जो इन बेलगाम घोड़ो को रोक सके ।

खबर की तह तक जाना आज मीडिया का एक उद्देश्य दिखता है क्यों न हो खबर जो लम्बी करनी होती है। और इसके साथ ही कुछ पैसे देकर उस खबर का ऐसा विवरण प्रस्तुत किया जाता है कि जैसे यदि यह खबर ना आती तो देश दुनिया और समाज गया ही था। लापरवाही की सारी हदें तब पार हो जाती है जब किसी मरते हुए व्यक्ति का लाइव कवरेज किया जाताहै जबकि वहां पर उसे बचाया जा सकता है । किसी महिला कि इज्जत को बेचा जाता है खबर बना कर ।

यदि मीडिया केवल न्यूज तक ही सीमित रहे तो शायद कुछ अपराध और गलत कार्यों पर रोक लग सकती है क्योंकि आज मीडिया का प्रमुख उद्देश्य जनता सेवा नहीं बल्कि खुद की झोली भरना मात्र है तो ऐसे में सच्चाई और झूठ का सममिश्रण ही मिल सकता है इसके सिवा और कुछ भी नहीं । और जो विचार होते है वो किसी ना किसी से प्रेरित होते है जिससे कुछ अच्छा और नया मिलने की उम्मीद बिलकुल नहीं की जानी चाहिए।

4 comments:

अनिल कान्त : said...

चैनल वाले टी.आर.पी. के चक्कर में क्या क्या नहीं करते

shyam kori 'uday' said...

... बिना ब्रेक की गाडी है पहले दूसरों को क्षतिग्रस्त करेगी फिर खुद हो जायेगी !

प्रकाश बादल said...

भाई अब पहले जैसा मीडिया कहाँ अब तो सब अपनी-अपनी दुकान चला रहे हैं। सब चाहते हैं कि दुकान चलती रहे फिर भला मीडिया का कोई मिशन कहाँ रह गया। अब तो मीडिया सच कहूँ तो प्रभावशाली लोगों की रख़ैल बनकर रह गया है। लेकिन फिर भी कुछ लोग हैं जिनमें चिंगारी दिखती है और संतोष होता है कि इन चंद लोगों की वजह से शायद पत्रकारिता बची रहे। और रही बात मीडिया के दायित्व की तो उसका मुख्य दायित्व तो अब पैसा कमाना है
मैने काफी समय पत्रकारिता की और एक दिन मुझे इसलिए पत्रकारिता से निकालने का षडय़ंत्र कामयाब हो गया कि मैंने पत्रकारिता को एक मिशन मान कर भ्रष्टाचार के खिलाफ पत्रकारिता की लेकिन मुझे ये बात तब पता न थी कि मुझे तो "दुकान" चलानी थी, खैर आज भी कई बार पत्रकारिता के घटिया स्तर को देखता हूँ तो हाथ में खारिश होने लगती है कि सब के सब को नंगा कर आऊँ मगर फिलहाल एक सरकारी नौकरी में क्लर्क के रूप में कार्यरत होने पर विवश हूँ वरना खाऊँगा क्या? आपका लेख अच्छा लगा सो इतनी बड़ी टिप्पणी दे डाली कुछ बुरा लगा हो तो माफी। और आपके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ।

राज भाटिय़ा said...

अजी मीडीया बचा ही कहां है भारत मै, सब्जी मण्डी बन गया है, सडी गली चीजो को भी झुठी तारीफ़ो से पेश करते है, लेकिन हम नही लेते भाई इन का गंद, जाओ हम नही देखते इन सडे गले कार्य कर्मो को
धन्यवाद