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Tuesday, March 31, 2009

दो औरत के झगड़े का मजा ......पूरे मोहल्ले वाले लें । आप भी लीजिए

यूँ तो महिलाओं के झगड़े हमने बचपन में बहुत देखे हैं । बिना बात के ही अगर लड़ने का मूड हो तो महा संग्राम शुरू हो जाता है । किसी से कुछ न कहा हो पर झगड़े के समय सारा प्यार उमड़ आता है । जैसे कितनी अच्छी हो ? फलां तुम्हारे बारे में ये ये ? सभी तुम्हारी पीठ पीछे क्या कहते हैं ? कुछ ऐसे ही प्यार मोहब्बत की बातें तीव्र रफ्तार से बिना किसी की परवाह किये हुए दागी जाती । दम भर भर के , सांस ले लेकर अपनी मधुर और सुसंस्कृत आवाज के द्वारा सारे आस पास के लोगों का रसपान कराती हैं । मजा आता ये देख मुंह छुपा के हंसो और चेहरे पर गंभीरता का होना जरूरी है । वरना आपके ऊपर भी कुछ न कुछ सुविचार का प्रवचन हो जायेगा ।

बात बहुत ही गौर करने की है जो मैंने देखा - एक परिवार में सभी खुश और आराम से रह रहें हैं । एक बच्चे ने अपनी मां से कह दिया कि चाची में मुझे गाली दी और अपने घर आने से मना किया । अब बच्चे की ही बात को सच मानते हुए । तलवारें बाहर झांकने लगी पहले तो कुछ दबी आवाज ही आती रही फिर धीरे धीरे आवाज की प्रतियोगिता शुरू हुई । एक दूसरे के सारी करतूतों का चिट्ठा एक ही पल में मोहल्ले वालों के सामने खोल दिया । कुछ देर बाद सब शांत होता है । फिर एक तरफ से खूब तेजी से रेडियों को पूरी तान में बजाया जाता है , तो दूसरी ओर एक महिला अपना गुस्सा बच्चे को पीट कर निकालती है । नजरे तिरछी हुई है । देखना पर नजर बचा के ।पता न चले कुछ ऐसे ।

पूरे मोहल्ले वाले भारजे पर लटक कर , झांक झाक कर मजा ले तमाशा देख रहे हैं । । कुछ समय तो हंसी खुशी बीत जाता है फिर सब शांत । सभी अपने घरों में कैद हो जाते हैं।
बिना बातों के लड़ाई और झगड़े इस तरह कई बार सामने आ जाते हैं जो कि कुछ ही वैमन्स्य की वजह से होते है । बात बहुत ही छोटी होती है या फिर कुछ भी नहीं होती । किसी पुरानी बात को यहां से पूरा कर लेते हैं । कुछ ऐसा है हमारा मोहल्ला और यहां के लोग कहने को पढ़े लिखे हैं पर योग्यता आपके सामने ही है । और क्या कहें

6 comments:

आलोक सिंह said...

वाह वाह क्या मोहल्ला है ,लगता है लड़ने की कला की दिक्क्षा ली है .

हिन्दी साहित्य मंच said...

आजकल ऐसा ही हो रहा है । बिना बात के ही मरने मारने पर उतारू है । महिला हो या और कोई

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

भई ये तो घर-घर,गली-गली,मुहल्ले-मुहल्ले और शहर-शहर का किस्सा है.चाहे ओर कुछ हमें आए न आए,लेकिन लडने की कला में हम लोग पूरे निपुण हैं.

निरन्तर- महेन्द्र मिश्र said...

भैय्या जी ये तो हर गली कूचे ब्लागों में चौराहों में सभी जगह चिल्लपों मची रहती है . लिखा बढ़िया है . धन्यवाद्.

अनिल कान्त : said...

सही बोल रहे हो मियां

Dr.Bhawna said...

सही कहा आपने...