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Wednesday, March 25, 2009

मैं खुश हुआ घर आने के लिए जितना मैं इलाहाबाद जाने के लिए ना था [संस्मरण]

बचपन में जब इलाहाबाद भैया के साथ पढ़ाई के लिए जाना हुआ तो मां का साथ छूट गया ......पर शहर जाने की खुशी में यह दर्द कम ही महसूस हुआ ......पहली बार ट्रेन का सफर करने का इंतजार लिए स्टेशन पर बैठा चार घण्टे काटना बेहद मुश्किल हो रहा था .......मई के महीने में तपती धूप से बचने के लिए पेड़ों की छाया में गर्म हवा का थपेड़ा गालों पर किसी जोरदार थप्पड़ से कम नहीं लगा......जैसे तैसे ट्रेन आयी ( पैसेन्जर) हम और भैया चढ़ गये ....सारी सीटे भरी थी पहले से ही और जहां सामान रखा जाता है वहां भी लोगों चढ़े थे ....यह देख भैया किसी से कह मुझे बैठा दिया और खुद खड़े रहे ( मैं खिड़की वाली सीट चाहता था जहां से बाहर का नजारा ले सकूँ ) ।रूकते चलते धीरे- धीरे ट्रेन इलाहाबाद के प्रयाग स्टेशन पर पहुंचने वाली होती है ( बीच-बीच में भैया सब जगहों के बारे में बताते जाते जैसे- गंगा नदी , फाफामऊ)। इस स्टेशन पर उतरना है भैया ने कहा - सभी अपने सामान( बोरी जिसमें चावल या फिर घर से लायी हुई खाने की वस्तुएं होती हैं ) समेटने लगे । सबके बीच में बहुत छोटा था फिर भी बेढ़गी लाइन में खड़ा हो गया (भैया ने हाथ पकड़ लिया मेरा और कहा जब सब उतर जाये तब उतरेगें) । हम भी उतरे पूरा स्टेशन शोर गुल से लबरेज हो गया ।

अब हम भी चल दिये अपने कमरे की तरफ , रास्ते में कुछ दूर पर ही रिक्शा मिलता था, वहा पहुंचे । एक कोई विद्यालय था ,कुछ लड़के खड़े हो चाय के साथ सिगरेट पी रहे थे तो कुछ किसी बात पर ठहाका लगा रहे थे यह देख मुझे बहुत ही अजीब लगा । रिक्शे से रूम पर पहुंचे ।

पहली बार घर से इतनी दूर मैं था ........सफर तो कट गया अब मां और अपने घर और गांव की याद आने लगी ...भैया ने कहा कुछ खा लो पर मैं न खा सका पता नहीं बस रोने का मन हो रहा था। साथ भैया थे इस लिए नहीं रोया ...वे किसीकाम से बाहर गये मैं सो गया था शाम हो चुकी थी इस अजीब माहौल में कुछ भी अच्छा न लग रहा था , जब भैया वापस आये तो मैं रोने लगा कहा कि घर जाना है तो भैया ने कह दिया कि ठीक है चलेंगें....... फिर चार दिनों तक रोने धोने के बाद भैया को वापस आना ही पड़ा मेरी जिद के आगे । एक बार फिर से मैं खुश हुआ घर आने के लिए शायद जितना मैं इलाहाबाद जाने के लिए ना हुआ था ।

4 comments:

आलोक सिंह said...

सही कहा घर से लगाव ही ऐसा होता है की कहीं और मन ही नहीं लगता , हमने भी जब घर छोडा था तो बहुत दिन उदास रहे पर बाद में जब दोस्त बन गए तो धीरे-धीरे घर की याद कम हो गयी .

अविनाश वाचस्पति said...

या तो खुश

या बेखुश

सफर सबका

खुशी का

खुशी से

पर जो
बेखुशी से होकर जाता है

उसमें ज्‍यादा खुशी दिलाता है।

Mired Mirage said...

पहली बार घर छोड़ना बहुत ही कठिन लगता है। माँ के लिए भी पहली बार अपने बच्चे को दूर भेजना बहुत कठिन होता है। आपका लेख पढ़कर मुझे वह समय याद आ गया जब मेरी बेटियाँ पहली बार मुझसे दूर गई थीं।
घुघूती बासूती

अनिल कान्त : said...

घर से दूर जाने पर ऐसा ही होता है

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति