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Wednesday, March 4, 2009

मिलना न हो सकेगा हमारा............ये तुम जानती हो

मिलना न हो सकेगा

हमारा,

जानता हूँ मैं,

और

जानती हो तुम भी,

फिर भी

ये प्यार है कि-

हमेशा साथ रहेगा,

हमेशा पास रहेगा,

जिंदगी कट जायेगी,

इसी के सहारे,

तुम न मिली तो क्या?

तुम साथ नहीं तो क्या ,

हमारी सुनहरी यादें,

हमेशा साथ रहेंगी,

भले तुम कितनी भी दूर रहोगी,

फिर भी पास रहोगी,

कोशिशें कामयाब नहीं हुई,

फिर भी

एक खुशी तो है,

इस बात कीहमें ,

तुम साथ थी

और रहोगी सदा,

सोचता हूँ मैंयही- -

फासले कितने हों

फिर भी दूरी नहीं,

साथ जो भी मिला ,

वो कम तो नहीं,

प्यार में ये सनम,

मिलना जरूरी नहीं।

11 comments:

सचिन .......... said...

अच्छी व्यक्तिगत कविता. यह हर प्रेमी का बयान हो सकता है, लेकिन क्या उससे ज्यादा कुछ नहीं.
क्यों ऐसा होता है कि हम किसी एक दृश्य, एक विवरण, एक घटना और एक समय को कविता में बांधते हैं. मुझे लगता है यह पाठक से ज्यादती है. जिसके पास वह अनुभव नहीं है उसके लिए यह कोई मायने नहीं रखती. उसके लिए वक्त की बरबादी है. तब निजी अनुभव को सार्वजनिक और हो सके तो सार्वभौमिक जुबान देना जरूरी हो जाता है....
दूसरी तरह से कहें तो एक प्रेम पत्र उससे जुडे दो दिलों के लिए अनमोल हैं, लेकिन बाकी लोगों के लिए वह कागज का एक लिखा हुआ टुकडा ही तो है...

अविनाश वाचस्पति said...

मीडिया व्‍यूह से बदल कर इस ब्‍लॉग का नाम प्‍यार व्‍यूह कर दें पर नया ब्‍लॉग बिल्‍कुल न बनायें। इसमें मीडिया से अधिक प्‍यार प्रमुख पा रहा है। अब यह प्रमुखता ब्‍लॉगस्‍वामी का प्‍यारप्रमुख होने की वजह से है, या प्‍यारविमुख होने की वजह से, इस पर किसी घनिष्ठ मित्र को शोध कर पीएचडी कर लेनी चाहिए।

सतीश चंद्र सत्यार्थी said...

बहुत ही प्यारी कविता
सचिन जी की टिप्पणी पर कहना चाहूंगा कि कविता हो कहानी हो या उपन्यास, लेखक की हर रचना व्यक्तिगत होती है. उसके स्रोत (अनुभव) हमेशा व्यक्तिगत होते है. हाँ प्रभाव भले ही सार्वजनिक और सार्वभौमिक हो सकते हैं. किसी भी रचना को समझने के लिए पाठक को उसके रचनाकार से जुड़ना पड़ता है. उसकी पृष्ठभूमि उसके व्यक्तिगत जीवन को जाने बिना रचना की तह में जाना असंभव है. रही व्यक्तिगत रचना के महत्व की बात तो पाठक रचनाकार की जगह स्वयं को, अपने परिवेश, अपने अनुभवों को रख कर देखता है तभी वह उसका रसास्वादन कर पाता है. और फिर दूसरों के अनुभवों, उनके विचारों के प्रति जिज्ञासा ही तो मनुष्य को मनुष्य बनाती है. एक असाहित्यिक (साहित्यिक निरक्षर) व्यक्ति के लिए दो प्रेमियों का प्रेमपत्र एक कागज़ का टुकडा मात्र हो सकता है पर एक साहित्यप्रेमी उस पत्र में डूब कर प्रेम के आनंद को महसूस कर सकता है भले ही उसने जीवन में कभी प्रेम न किया हो.

Udan Tashtari said...

क्या बात है..संपूर्ण प्रेम दर्शन है.

Pankaj said...

realy ye bahut hi pyari poem hai ..maine ese padha bahut achha laga..its lines..give me pleaser

vandana said...

:)अच्छी है..!!

bhawna said...

O HO ! JIS CHETRA SE AAP JUDE HUE HAIN (PATRAKAARITA)USME SAMANE KE BAAD KUCH SAALON BAAD AAPKO SHAYAD YE BHI NAA YAAD RAHE KI YE KAVITA AAPNE KISKE LIYE LIKHI THI YE ALAG BAAT HAI KI JISKE LIYE LIKHI USE YAAD RAHE (AGAR USE PADHAI HOGI TO!):) BURA MAT MANIYEGA ACHHI LAGI AUR ISLIYE DIL ME JO AYA LIKH DIYA .

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही प्यारी ओर सुंदर कविता,
धन्यवाद

अनिल कान्त : said...

अच्छा लिखा है दोस्त ......अच्छी रचना

vinodbissa said...

निशू जी शुभकामनायें ॰॰॰॰ इस रचना के माध्यम से आप प्यार के असली स्वरुप को सफलतापूर्वक प्रस्तुत करने में सफल रहे हैं ॰॰॰॰॰ इसके लिये आप बधाई के पात्र हैं ॰॰॰॰
" प्यार में ये सनम,
मिलना जरूरी नहीं " ॰॰॰॰॰ ये पंक्ति पूरी कविता का सार है ॰॰॰॰ बहुत अच्छी रचना है ॰॰॰॰ शुभकामनायें ॰॰॰॰

Vijay Kumar Sappatti said...

DEAR NEESHU

sorry for late arrival , i was on tour.

ab main kya tareef karu ,aapki rachna ki , dil ko choo gayi hai aur man men kahin jakar biath gayi hai .. merei taraf se dil se daad kabul karen ..

main bhi kuch likha hai , jarur padhiyenga pls : www.poemsofvijay.blogspot.com