जन संदेश

पढ़े हिन्दी, बढ़े हिन्दी, बोले हिन्दी .......राष्ट्रभाषा हिन्दी को बढ़ावा दें। मीडिया व्यूह पर एक सामूहिक प्रयास हिन्दी उत्थान के लिए। मीडिया व्यूह पर आपका स्वागत है । आपको यहां हिन्दी साहित्य कैसा लगा ? आईये हम साथ मिल हिन्दी को बढ़ाये,,,,,, ? हमें जरूर बतायें- संचालक .. हमारा पता है - neeshooalld@gmail.com

Thursday, March 5, 2009

इस अवसाद से बचाव क्या ? सुरभि बता रही है कि कितना सच है मल्थास का सिद्धांत.......पढ़े यह स्वास्थ्य आलेख


मानव ने विकास तो खूब किया । आधुनिक संसाधनों , सुरक्षित मापदंड को ध्यान में रखते हुएसूखा , अकाल,भुखमरी ,फ्लेग जैसी महामारियों से लड़ने के लिए आधुनिक संसाधनों से सुरक्षित उपाय खोज लिए |अब इंसानों को लम्बी उम्र यानी कि अमर बनाने के उपाय पर भी खोज जारी है, ऐसे में माल्थस का जनसंख्या का सिद्धांत हारता नजर आता है पर एक ओर तो किसी कि नजर नहीं गयी जो साठ दसको से आहिस्ता -आहिस्ता अपने कदम बढ़ाता चला जा रहा है ,समाज की रग-रग में समाता चला जा रहा है महामारी की तरह |


आज देश हमारा विकास के पथ पर अग्रसर है , देश की क्षमता युवाओ से ही है , ओर ये दुश्मन युवाओ को निगलने की फिराक में है, हर वर्ष ५५००० हजार लोग इसकी वजह से मौत के मुह में चले जातेहैं। , साथ में चली जाती है उन युवाओं की योग्य बनानेकी सारी मेहनत |अब उसकी नजर अपने नए ग्राहक के रूप में बच्चे व महिलाये है ,और वो उनको लुभावने रूप रखकर प्रभावित कर रहा है । पर अब तकमैंने उस बहुरूपिये का नाम तो बताया ही नहीं चलिए उससे परिचित करती हूँ। सावधान रहने के लिए |

पहले ये शराब ,भांग, अफीम के रूप में था पर अब इसने भी अपना आधुनिकीकरण कर लिया स्मैक, चरस, गांजा,हिरोइन नशीली की गोलियां जो कि रजनीगंधा ,पान मसाला ,त्रिकाल, पेंथर ,आनंद ,लहर ,कमला पसंद आदि अनेक नाम से मौत बिक रही है । साथ ही सस्ते होने के नाते में युवाओं की पहुंच भी है | परिणाम स्वरुपकुछ समय बाद उन्हें इसकी लत लग जाती है और टी बी कैंसर एड्स जैसे भयानक रोग उपजाते है ।


हैरानी की बात तो ये हैकि जो कंपनियां तंबाकू उत्पाद बनाती हैं। वे जानती है कि हमारे नियमित ग्राहक कुछ दिनों बाद ख़त्म हो जायेगे शायद इसीलिए नए ग्राहक के रूप में उनकी नजर बच्चों और महिलाओं पर है |
आज बच्चो के लिए सिगरेट के आकर की टाफियां और तम्बाकू गुटके की तरह मीठी सुपारी के पैकेट बाजार में उपलब्ध हैं। और बच्चे भी बड़ों के अंदाज में इन उत्पादों को खरीद कर खाते हैं।


कुछ समय के बाद बच्चे इन सब को छोड़ नशीले उत्पादों को भी प्रयोग करने लगे तो आश्चर्य नहीं ,
बच्चों के आदर्श तो घर के बड़े ही होते हैं। और वे उनके ही जैसा ही बनना चाहते हैं। ताज्जुब की बात है कि तंबाकू से उत्पन्न बीमारियों से लड़ने की दवाएं अधिकतर तंबाकू उत्पादन करने वाली कंपनियां ही बनाती हैं। |लाभ हर हाल में इनको ही मिलता है । जनता को नहीं |अगर अब भी हम सचेत न हुए तो मल्थास का जनसंख्या का सिद्धांत सच साबित होजायेगा |हमारे हाथ जो शेष होगा वो अर्द्धऔरदुधमुहे बच्चे को पालने वाली शक्ति से हम वंचित हो जायेंगें। देश ने जो विकास किया है उसे आगे बढ़ाने वाली युवा शक्ति ही नहीं रहेंगी तो देश विकसित देशो के हाथ में आ जायेगा। और एक दिन ऐसा आएगा कि फिर हम विकसित देशो के गुलाम कहलायेगे ,पूर्णतया आर्थिक रूप से गुलाम हो जायेगे |
समय रहते हमें सचेत हो जाना है ,अभी भीसंभलने का वक़्त है हमारे पास अपने को व अपने प्रियजनों को नशे से दूर रखने का और अपने समाज को नशे के हर रूप से बचाए |हमारा ये नेतिक दायित्व भी है समाज के प्रति ..........



लेखिका- सुरभि

4 comments:

neeshoo said...

सुरभि जी इस आलेख के लिए शुक्रिया । आपने स्वास्थ्य पर जो बातें लिखी है इस आलेख में गौर करने योग्य है । अपने आस-पास परिवार में तंबाकू के प्रभाव को बिल्कुल रोका जाना चाहिए । जिससे स्वास्थ्य समाज का निर्माण हो सके । बधाई

रवीन्द्र प्रभात said...

बातें गौर करने योग्य है...तंबाकू के प्रभाव को बिल्कुल रोका जाना चाहिए ।

Arvind Mishra said...

कौन जाने अंत में जीत माल्थस की ही हो ?

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुंदर ढंग से आप ने इस बात से सचेत किया, लेकिन मेने देखा है कि आज पढे लिखे लोग भी ताम्बाकू का उपयोग बहुत ही शान से करते है.
धन्यवाद