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Friday, March 27, 2009

बार बार टूटता जुड़ता रहा ये दिल

जाने कितनी बार टूटता और जुड़ता रहा है ये दिल .......किसी से कभी किसी कल्पना से हटकर कुछ नया हो जाये तो कल्पित हो तो जिंदगी राहें खुद--खुद रौशन सी लगती हैं किसी बात पर प्यार .....फिर अगले ही पल किसी बात पर तकरार और बातों से ही इनकार कर साफ मुकर जाना कि मैंनें तो ऐसा कहा ही नहीं....या मेरे कहने का ये मतलब ही नहीं था कुछ ऐसे ही बीतते पल का साथ खुशनुमा लगता है.....ज्यादा चाहत का साथ पर हो इसके विपरीत तो मन ही मन कुत्सित विचार का आगमन हमेशा ही विरोधाभास पैदा अपने आप में ......जिसको सब देखें वो नजर आपको देखे तो प्रेम का चर्मोत्कर्ष ही सामने आता है .........कभी-कभी यह सब व्यर्थ और जीवन व्यंग्य जैसा प्रतीत होता है तो कभी अपना अतीत लगता है इस जद्दोजहद में किसी भी निर्णय पर जाना सा अनुचित और अव्यवारिक हो सकता है ......और होता भी है
मोबाइल से बना हुआ विश्वास मोबाइल से ही टूट जाता है .......देखने की ख्वाहिश .......मिलने की पयमाइश दिल के समंदर में हिलोरे लेता हुआ दफ्न हो जाता है .......हवा का बहाव अपनी दिशा के विपरीत होता देख क्या दुख नहीं होता.....इन सब बातों से पर हटकर ये जताने और दिखाने की कोशिश लिये की गम की एक शिकन तक आसपास नही है अपने आपने बहुत ही बड़ी और विकट चुनौती है ......साथ चलने का वादा....दी हुई कसमें टूटती और बिखरती है आखों के सामने तो मन मसोस कर दर्द की वेदना को सहना असहनीय हो जाता है कुछ कम ही मिलते थे तो भी खुशी की लहर पैरों को गुदगुदाती हुई प्रेम की पराकाष्ठा का जो अनमोल अनुभव कराती.... वह यादों में बदल जाये तो जीवन का अस्तित्व भी खतरे में जान पड़ता है ।।..
दूरियों से नजदीकियां बनती है तो मन प्रसन्नता की असीम ऊंचाई पर जा बसता है और जब इसके उलटे नजदीकियां दूर जाती है तो आपने आप को संतुलित करना क्यों मुशिकल हो जाता है ? विरह वेदना का स्वरूप इतना कष्ट दायक जान पड़ता है कि जिसकी कोई परिधि और कोई सीमा नहीं
इस व्यथा का शायद कोई उपचार नहीं हो ...इंसान की फितरत और इंसान की फितरत के आगे इंसान का झुकना किसी को आराम देता है तो किसी को खुद गुनहगार साबित करता है एक ही परिदृश्य में अलग अलग मायने नजरों के सामने आते हैं ।।खुद को सोचते हुए कुछ नहीं पाते सिवाय बेबसी के और आखिर तक उम्मीद का दामन पकड़े रहते हैं जब कि कोई आशा और धारा का रूख हमारी ओर नही है परन्तु इस सब गहमो गहमी के बीच अपने को दिलासा देने का यही बेहतर और सही तरीका है। किसी को बुरा और गलत साबित कर कुछ हासिल हुआ और नहीं होने वाला ..और. वह गलत और गुनहगार हो हीनहीं सकता जो इतना हर दिल अजीज हो , प्यारा हो

4 comments:

आलोक सिंह said...

इतने भारी-भरकम शब्दों का प्रयोग हुआ की कई बार पंक्ति को पढना पड़ा समझने के लिए . किसी को बुरा और गलत साबित कर के कुछ मिलता नहीं पर एक तस्सली मिलती है . जो सबके दिल को प्यारा हो और वो गलती नहीं करेगा इस बात को मैं मानता नहीं . पर आपने कहा है तो मान लेता हूँ .

अनिल कान्त : said...

दिल की बातों को यहाँ रखा ...बहुत अच्छा लगा

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

आपने अपनी बात रखी है और ठीक किया है.

SWAPN said...

cicharon ki abhivyakti zaroori hai.