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Monday, March 31, 2008

वास्तविकता और ग्लैमर पत्कारिता की।

मीडिया को चौथा स्तम्भ कहा गया है लोक तंत्त का । और ये बहुत हद तक सही भी है । अगर पत्कारिता न होती तो ये लोकशाही का चोला पहने हुए नेता आजाद रहते । किसी का डर नहीं होता पर मीडिया ने इन लोगों पर जरूर लगाम लगाया है। । और बीते कुछ वर्षओं में जो स्टिंग आपरेशन हुए उससे ये नेता और भी सजग हो गये।
पत्कारिता में कैरियर बहुत ही उज्ज्वल है पर आपमें दम होना जरूरी है आपकी जड़ मजबूत होनी।चाहिए। मीडिया संस्थान की भरमार है ,अब आप को ये देखना है कि आप के लिए सबसे अच्छी शिक्षा कौन दे सकता है। ये आपको स्वयं चुनना होगा। वैसे भी चलये आपने पढ़ाई पूरी कर ली तोअब आप को आवश्यकता होती है किसी भी चैनल या फिर एन जी ओ या फिर न्यूज पेपर में जाब मिले जिससे रोजी रोटी आगे बढ़े।
बड़ी भाग-दौड़ करने के बाद जाब कहीं न कहीं तो मिल ही जाती है, कयोंकि भारत में पता नहीं कतने अखबार निकलते है , चैनल सुरू होते हैं और कब बंद हो जाते हैं ै तो इसमें आसानी से स्थान बनाया जा सकता है।चलिये जनाब नौकरीमिल गयी।।
अब प्रमुख बात कि हमने पत्रकारिता को क्यों चुना ? आखिर हम इस फील्ड में क्यों आये ? कुछ उद्देश्य होगें कुछ मन में सपना रहा होगा?इसलिए आये ।
समाज के विकार को दूर करने के लिए प्रयास कर सकें इस लिए आये।पर सच्चाई तो कुछ और ही हो जाती है । क्योंकि किसी किताब में मैने पढ़ा था कि आजादी के पहले की पत्रकारिता एक जज्बा थी ,आग थी। और एक उद्देश्य को लेकर चली थी । वैसे आज भी पत्रकारिता का उद्देश्य पर वह है खुद को लाभ पहुचाना। एक रोजगार बन गया है यह । कलम की ताकतपैसे के सामने झुकती है, कलम की धार में वो पैना पन नहीं रहा जो कि होना चाहिए ।।
मैं भी पत्रकारिता का छात्र हूँ और इस लिए अभी तक मेरे सोच के अनुसार- मैं पत्रकारिता को एक रोजगार के रूप में देखूँ तो ही अच्छा रहेगा।।
्।
समाचार ,अखबार वो माध्यम है जो कि लोकतंत्र की शक्ती हैं और इनका ये व्यवसायीपन कहां तक सही है ?आखिर आम जनता का क्या होगा ? कई अखबार ऐसे हैं ( नाम लेना उचित नही है) जिनमें खबरें कम और एडव्रटीजमेंट ज्यादा होता है । । एक पालिशी के तहत सारा काम होता है । अगर आप स्वातनत्रत लेखन को सोचके आये हैं इस फील्ड में, तो बदालिए खुद कोनहीं तो आगे बहुत मुशकिलें आने वाली हैं।।
एक पत्रकार के सारे सपनोंं को टूटता देखता ह मैं । संपादक की कुर्सी पे बैठा है व्यवसायी । खबरों की सच्चाई को कत्लेआम कर देता । ँदुख भी होता और घुटन भी पर क्या कर सकते हैं ? इसी तरह से जीना है । यही है वास्तविकता पत्रकार की......

4 comments:

Kiran said...

पत्रकार के जीवन की वस्तविकता है!
-किरन

रश्मि प्रभा said...

सच कहा.....बहुत विरोधात्मक परिस्थितियाँ हैं,
शायद गुलामी इतनी जटिल नहीं थी,
कम-से-कम गुलाम होने का धब्बा था,
अब तो बस धब्बा ही धब्बा है.......
तुम्हारा मीडिया प्रस्तुतीकरण लाजवाब है.

Dr. MITTAL SHRI KRISHAN said...

सच कहा

लेकीन स्पर्धा ने इसे भी बिकाऊ बना दीया है. ब्लैक मेलिंग हथिआर के रूप में उपयोग कर कितनी ही जगहों पर पत्रकार बिकते देखे गए है.
सत्ता के गलिआरों में छुद्र लाभों के लीये पत्रकारों को खडा देखा जा सकता है.
यानी आज की पत्रकारिता सेवा न रह कर दलाल, वेश्या, पेशा होगई है .
फिर भी पत्रकारिता आज लोकतंत्र का सबसे सुद्रढ़ पाया है जो तत्काल न्याय दिलवाता है और सत्ता परिवर्तन की छमता रखता है.
तुम्हारा मीडिया प्रस्तुतीकरण लाजवाब है.

surabhi said...

पत्रकारिता एक पाक रिश्ता कायम करता है समाज में
अगर पत्रकार पाक दमन हो
लिकिन पत्रकार भी इन्सान है उसे भी भूख प्यास लगाती है
अगर वो इस कि खातिर कोई नोकरी करता है तो ये उसका भी हक़ है
मगर ज्यादा के चक्कर में पड़ आपने को बेचे न
और सभी ऐसे होजाते तो देश इतना सभाल कर न चल पता
इसका मतलब कुछ बुरे होसकते सब नहीं
शायद थोडी-थोडी बुरईया तो सभी जगह मिल ही जाती
बस सभाल कर लिखना है
आप बधाई के पात्र है जो आपने नाजुक नश पर हाथ रखा समाज कि
surabhi