जन संदेश

पढ़े हिन्दी, बढ़े हिन्दी, बोले हिन्दी .......राष्ट्रभाषा हिन्दी को बढ़ावा दें। मीडिया व्यूह पर एक सामूहिक प्रयास हिन्दी उत्थान के लिए। मीडिया व्यूह पर आपका स्वागत है । आपको यहां हिन्दी साहित्य कैसा लगा ? आईये हम साथ मिल हिन्दी को बढ़ाये,,,,,, ? हमें जरूर बतायें- संचालक .. हमारा पता है - neeshooalld@gmail.com

Monday, March 31, 2008

गरीबी ही का तो दुख है


मेरा लड़का डाक्टर बनेगा , मेरालड़का इंजीनियर बनेगा ऐसा सपना हर मां बाप अपने बच्चओं के लिए देखा करते हैं । आखिर कौन नहीं चाहता कि उसके बच्चे खुशहाल रहें। बात शिक्षा की है । सपने देखना अच्छा होता है पर सपनों को सच करना तो थोड़़ा मुश्किल काम होता है हां अगर सही दिशा में प्रयास करें तो कुछ भी सम्भव है । "कौन कहता है कि आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तबियत से तो उछालों यारों " ये एक ऐसा शेर है जो जगाता है आशावादी सोच को कुछ कर गुजरने के माद्दे को।
आज की शिक्षा का स्तर बहुत अच्छा होते हुए भी अच्छा नहीं है .स्कूल के अलावा भी ट्यूशन का फैशन चल निकला है जैशे इसके बगैर शि्षा अधूरी सी हो गयी है।आम आदमी की बात की जाय तो आज के समय में आम आदमी के लिए बच्चओं को अच्छी पढ़ाई करना बहुत ही मुशकिल हो गया है। क्यों कि महगाई की रफतार से आय की रफतार कहीं ज्यादा ही धीमी है। तो ऐसे में अच्छी पढ़ाई के लिए अच्छा पैसा भी होना आवश्यक हो गया है , अगर किसी मध्यम वर्ग के परिवार में दो बच्चे हैं तो बहुत हीहठिनाई के साथ उनको पढ़या जा सकता है । वो भी इण्टर तक{12 वीं क्लास } । इसके बाद की बात की जाय तो लोग आज केवल प्रोफेशन कोर्स को पढ़ना ज्यादा अच्छा मानते है ,और बात भी सही है क्यों कि पढ़ाई कर के लड़का तुरंत हीकमायी करे यही चाहते हैंसभी । पर प्रोफेशनकोर्स कि फीस की बात ही क्या है दिन दूना रात चौगुना बढोत्तरी हो रही है तो आप बताइये कि इतना पैसा आयेगाा कहां से । अगर कहीं से आभी जाता है तो उसकी भर पाई कैसे होगी । दो जून की रोटी जिसको बमुश्किलन नसीब हो रही है वह भला ऐसा रिश्क कैसे ले सकता है।
हां सरकार के द्वारा एजुकेशलन लोन की व्यवस्था जरूर है पर ये लोन उसी को आसानी से मिलता है जिसके पास पहले से कुछ है या फिर मोटी रकम को दिया बैंक के अफसर को। तो इतना झंझट कौन करे हां ।हांपर जिन्होंने किया है वे अपने आप में मिसाल जरूर हैं । रोजगार के अवसर बहुत है पर पैसे वालों के लिए ही।
पढ़ाई का स्तर सुधरा है पर गरीब के लिए नहीं । मतलब जो अमीर हैं वो तो अमीर बनेगे ही न। भला गांव का मजदूर क्या सोचेगा ये सब बस .जिने कमाने में ही पूरा जीवन कट जाय बहुत है ।
कुछ कार्यक्रम बनाने से नही बदल सकता है गरीब घर । और इनको ही बदलना है अब कैसे ?
कोई चमत्कार तो होगा नहीं. करना तो हमको ही होगा न तो हम जो कर सकते है वो करें यह हमारे ऊपर है कि हम क्या कर सकते हैं।।।
सपने के भारत में आखिर इन लोगों का भी तो सपना जुड़ हुआ है न।तो इनके बारे में भी सोचना ही होगा??

6 comments:

Kagahn said...

See please here

vinodbissa said...

" गरीबी ही का तो दुख है"".........
अच्छा विषय है, गंभीर विषय है, चिंतनीय विषय है .... इस दिशा मैं क्रांतिकारी निर्णय लेने होंगे तभी यह समस्या दूर होगी ......... सरकार की जवाबदारी है की वो कुछ मुद्दे जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य को पूर्णत: अपने नियंत्रण में रखे ... मंहगी शिक्षा का बोझ शासन स्वयं उठाए ...... यह संभव है ...... शासन अगर ठान ले..... आज किसान का साठ हजार करोड़ रूपये शासन एक मुस्त माफ कर सकता है तो क्यों नहीं एक से दो हजार करोड़ रूपये मात्र के खर्चे वाले शिक्षा व्यय को स्वयम उठाती...... बहस का विषय बहुत लम्बा है यहाँ संभव नहीं उतना विस्तार मैं जाना ....
निशु जी आपने गभीर चिंतन की ओर लोगो को प्रवृत किया उसने लिए आपको बधाई एवम शुभकामनाएं....

रश्मि प्रभा said...

सपने हैं तो साकार होंगे.....तुम्हारी पुकार ईश्वर तक जायेगी,
तभी तो हम भी कहेंगे,
अगर सही दिशा में प्रयास करें तो कुछ भी सम्भव है । "कौन कहता है कि आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तबियत से तो उछालों यारों

KRAZZY said...

bahut acchhi rachna hai.main aap se poori tarah sehmat hun.shiksha me ko bhi business bana kahin se bhi sahi nahin hai.iska par vichaar karna ati avashyak hai.

Dr. MITTAL SHRI KRISHAN said...

प्रीयवर, बधाई
मुंशी प्रेम चंद ने इस विषय पर इतना सुंदर लीखा है की हर हिंदी उर्दू लेखक उनसे प्रेरणा लेता है. विषयरचना में अगर कुछ रंगत लायें तो जयादा कामयाब होंगे. पिछली कुछ कृतियाँ थोड़े से अलंकार मांगती हैं.

Amma said...

गरीबी.......कैसा अभिशाप!
चित्रण सही उकेरा