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Tuesday, March 25, 2008

कहानी कमली की ................

कमली आज बिल्कुल भी बोल नही रही थी कयों कि उसे मार पड़ी थी ,उसने घर का काम जो पूरा नही किया था।कमली के लिए ये कोई नयी बात नही थी , दिन या दो दिन में मार पड़ ही जाती थी बेचारी अपना गुस्सा चुप रहकर ही निकालती थी बिना किसी से बात किये हुए।
बचपन से ही अभागी रही थी , पैदा होते ही मां चल बसी और बाप का कुछ पता ही नही बचपन क्या होता है पता ही नही? रहने के लिए उसेमिला विशाल आकाश और खेलने के लिए प्रकृति की गोद। दुखमय जीवन में खुश रहने के सारे तरीके सीख लिये थे कमली ने।
हमेशा छोटी-२ बातों पर मुस्कुराती , सब की चहेती थी, पास की बुआ जी बहुत मानती थी कमली को। वैसे तो कपड़े और खाने की दिक्कत नही हुई पर प्यार नही मिला। इन सब बातों से परे हटकर कमली खुश थी। पढ़ाई का शौक था, पर उसकी चाची उसकी सबसे बड़ी दुश्मन थी, जानवरों जैसा वर्ताव था कमली के साथ, बात-बात पर पिटाई कर देती थी उसकी. इसीलिए आज भी घर का सारा काम न होने पर पिटाई की थी।
कमली को देखा नही था मैने ,केवल सुना था।
कमली को आज देखा मैने पर बात नहीं कर सकता था, वह सोचुकी थी गहरी नींद में हमेशा के लिएचल दी थीअनन्त यात्रा पर। मानों उपहास कर रही हो जमाने का किअब कौन छीन सकता है मेरी खुशी और मेरी हसी को?वह आजाद हो गई थी अपनी बेड़ियों कोतोड़ के वैसे भी उसकि हक नही था इस जहां में रहने का। जीवन के असीम आनंनद में कुछ भी नही था उसके लिए।
सफेद कफन सेढ़का उसका शरीर, और कफन के उपर कुछ गुड़हल और गेदें के फूलथे. शायद जिसके साथ वो कभी खेला करती रहीहोगी। वही साथ है उसके। पास बैठी कुछ औरतें और दूर पर शोर करते बच्चे।
कुछ देर तक मैं ररूका रहा उसके चेहरे को दखने के लिए। उसकी एक झलक पाने के लिए। काश कोई आये और उसके चेहरे से सफेद कफन को हटाये पर ऐसा नही हो रहा था। पेड़ की पत्तियों के बीच से सूरज की किरणें भी आज कमली को देखने के लिए व्याकुल थी. परेशान थी .पर वह तो चुपचाप सो रही थी किसी की परवाह किये बिना। ऐसे में हवा के एक झोके ने उसे जगाने का प्रयास किया था ,पर कमली तो न उठी पर उसके चेहरे से कफन जरूर हट गया था। कुछ देर तक मैं एकटक देखता रहाथा कमली को। कितनी मासूम ,कितनी भोली सूरत ।एकाएक मै उठकर चल दिया था वहां से दुख और ग्लानि लिये हुए मन में । मन में यही प्रश्न लिए कि उसने अपने को खत्म कयों किया ? आखिर क्यों?

8 comments:

सुनीता शानू said...

नीशू बहुत अच्छे भाव हैं लघु कथा में बाँध रही है पाठक हो...शुक्रिया

surabhi said...

kamali
ki kamoshi
man ko chhu gaee
par agar kahanei me visram lagane se pahale kuchh masum man ke bhav bhi jud jate to achchha hota
ye meri sirph soch hai shayad ...

रश्मि प्रभा said...

अनंत काल से यह प्रश्न अनुत्तरित है,
रुलाता है,खामोशी पैदा करता है.......
तो खामोश ही रहें.

tanha kavi said...

कहानी और अच्छी हो सकती थी नीशु जी। भाव पूरी तरह से खुल नहीं पाए हैं।

-विश्व दीपक ’तन्हा’

Dr. MITTAL SHRI KRISHAN said...

कमली आज बील्कुल भी बोल नही रही थी कयों की उसे मार पड़ी थी ,उसने घर का काम जो पूरा नही कीया था।कमली के लीये ये कोई नयी बात नही थी , दीन या दो दीन में मार पड़ ही जाती थी बेचारी अपना गुस्सा चुप रहकर ही नीकालती थी बीना कीसी से बात कीये हुए।
बचपन से ही अभागी रही थी , पैदा होते ही मां चल बसी और बाप का कुछ पता ही नही बचपन क्या होता है पता ही नही? रहने के लिए उसेमीला वीशाल आकाश और खेलने के लिए प्रकृती की गोद। दुखमय जीवन में खुश रहने के सारे तरीके सीख लीये थे कमली ने।
हमेशा छोटी-२ बातों पर मुस्कुराती , सब की चहेती थी, पास की बुआ जी बहुत मानती थी कमली को। वैसे तो कपड़े और खाने की दीक्कत नही हुई पर पयार नही मीला। इन सब बातों से परे हटकर कमली खुश थी। पढ़ाई का शौक था, पर उसकी चाची उसकी सबसे बड़ी दुश्मन थी, जानवरों जैसा वर्ताव था कमली के साथ, बात-बात पर पीटाई कर देती थी उसकी. इसीलिए आज भी घर का सारा काम न होने पर पीटाई की थी।
कमली को देखा नही था मैने ,केवल सुना था।
कमली को आज देखा मैने पर बात नहीं कर सकता था, वह सोचुकी थी गहरी नींद में हमेशा के लीयेचल दी थीअनन्त यातरा पर। मानों उपहास कर रही हो जमाने का कीअब कौन छीन सकता है मेरी खुशी और मेरी हसी को?वह आजाद हो गई थी अपनी बेड़ियों कोतोड़ के वैसे भी उसका हक नही था इस जहां में रहने का। जीवन के असीम आनंनद में कुछ भी नही था उसके लीये।
सफेद कफन सेढ़का उसका शरीर, और कफन के उपर कुछ गुड़हल और गेदें के फूलथे. शायद जीसके साथ वो कभी खेला करती रहीहोगी। वही साथ है उसके। पास बैठी कुछ औरतें और दूर पर शोर करते बच्चे।
कुछ देर तक मैं रृका रहा उसके चेहरे को देखने के लीये। उसकी एक झलक पाने के लीये। काश कोई आये और उसके चेहरे से सफेद कफन को हटाये पर ऐसा नही हो रहा था। पेड़ की पत्तियों के बीच से सूरज की कीरनें भी आज कमली को देखने के लिए व्याकुल थी. परेशान थी .पर वह तो चुपचाप सो रही थी कीसी की परवाह कीये बीना। ऐसे में हवा के एक झोके ने उसे जगाने का प्रयास कीया था ,पर कमली तो न उठी पर उसके चेहरे से कफन जरूर हट गया था। कुछ देर तक मैं एकटक देखता रहाथा कमली को। कीतनी मासूम ,कीतनी भोली सूरत ।एकाएक मै उठकर चल दीया था वहां से दुख और गलानी लीये हुए मन में । मन में यही प्रश्न लीये की उसने अपने को खत्म कयों कीया ? आखीर क्यों?

Dr. MITTAL SHRI KRISHAN said...
This comment has been removed by the author.
Dr. MITTAL SHRI KRISHAN said...

एक अच्छा प्रयास. - कहानी में रंग भरने के लीये कुछ और भी जोडा जा सकता था. जैसे कमली की बड़ी संपती जो चाचा चाची को कमली को घर में रखने को मजबूर करती थी. चाची की हम उम्र बेटी जीसको सारी सुवीधा मीलती थी आदी

mahashakti said...

सुन्‍दर लघु कहानी, बधाई