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Friday, September 28, 2007

मुश्किल में सरकार


सेतुसमुद्रम कनाल प्रोजेक्ट को भाजपा ने धर्म से जोडकर राष्टीय मुद्दा के रूप में प्रस्तुत कर दिया । सोयी हुई राजनीति में गरमाहट आ गयी और फिर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करूणानिधि के बयान " जब राम ही नहीं तो राम सेतु कैसा" को लेकर पक्ष और विपक्ष में जबरदस्त टक्कर देखने को मिली। पक्ष की मुश्किलों को संस्कृति मंत्री अम्बिका सोनी और जहाज रानी मंत्री टी आर बालू और कानून मंत्री हंसराज के सुप्रीमकोर्ट में राम सेतु मुद्दे पर दाखिल हलफनामें ने और बढ़ा दिया। तथा सरकार दबाव में आगयी ।और इसके चलते अन्ततः काग्रेस को विपक्ष के विरोध के चलते अपने हलफनामें वापस लेने पड़े।
अमेरिका भारत परमाणु समझौते को लेकर पहले से ही लेफ्ट और भाजपा सरकार पर दबाव बनाये हुए है ।तथा कुछ ऐसी परिस्थितियां बनती जा रही है जिससे की मध्यावधि चुनाव के संकट मडराने लगा है । हाल के दिनों में काग्रेस ने पार्टी में कई बदलाव किये है। जिसको की भाजपा चुनाव की तैयारी के रूप में देख रही है।
भाजपा ने सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट के तहत एडम्स ब्रिज को तोड़ने (भाजपा जिसे राम सेतु का नाम दे रही हैऔर भगवान राम द्वारा निर्मित मानती है) का विरोध कर ही है। और इसे देश की धार्मिक आस्था से जोड़ रही है । हाल के दिनो़ में भाजपा के कार्यकारिणी की बैठक भोपाल में हुई। जहां विश्व हिन्दू परिषद तथा भाजपा ने राम सेतु मुद्दे को भावी चुनावी मुद्दे के रूप में रखेगें।
फिलहाल जो स्थितियाँ बन रही है उसे देखते हुए काग्रेस की मुश्किल बढ़ती ही दिख रही है।अभी ६ महीने बाद परुमाणु मुद्दे पर जो समिति गठित की है उसकी भी रिपोर्ट आयेगी ।जिस पर काग्रेस को पहले से ही लेफ्ट से घिरा है
।अब कैसे छुटकार पाती है काग्रेस यह देखने की बात होगी । या फिर सरकार गिरती है और चुनाव होतें है। ये तो आने वाला समय ही बतायेगा?

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