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Friday, September 21, 2007

जरा नजर इधर भी करिये जनाब , सच भी देखिये ना


मैं हमेशा से कई चीजों के खिलाफ रहा हूँ। जिसमें से भिक्षावृति एक है । मेरा मानना है कि क्या मेरे १ रूपये देने से इनके कष्ट में कमी आ सकती है तो मैने पाया की नहीं। हाँ एक बात ये हो सकती है कि एक दिन के लिए उनकी कमायी में कुछ जरूर मदद हो जाए पर क्या इससे उनका ये भीख मागना छूट जायेगा नहीं कभी नहीं । मैं पहले सोचा करता था कि ये भीख मांगने वाले लोग जो भी पैसा पूरे दिन में कमाते है वह पूरा पैसा इनका हो जाता है पर जब मैने सच्चाई जानी तो और भी दुखी हुआ । क्या आपको मालूम है कि भीक्षावृति का भी एक व्यापार होता है ? इसको चलाने वाले भी कोई और है जो भीख मांगते हुए दिख जाते है ये मात्र एक दिहाडी वाले मजदूर मात्र के रूप में कार्य करते हैं।सारी कामयी में इनको दिन की मजदूरी के अलावा कुछ भी नहीं मिलता ।
इस भीक्षाबृति का कारोबार आजकल बहुत ही तेजी से बढ़ रहा है । इसका उदाहरण हम चौराहों पर जाम के बीच और बाजार और भीड़ वाली जगह पर आसानी से देख सकते है। मुझे जब यह पता चला कि इस कारोबार में छोटे बच्चों का बहुत ज्यादा उपयोग हो रहा है खासकर जो १ साल से लेकर १२ साल तक के बच्चें है। और जिस बच्चे की उमर जितनी कम होगी उसी अनुसार उस बच्चे को पैसा अधिक मिलता है । ये वो बच्चे होते है जिनके माँ-बाप इनका पालन-पोषण नहीं कर पाते है कारण होता है अधिक बच्चे होना जिस वजह से इनके माता पिता इनका लालन - पालन कर पाने में असमर्थ होते हैं और मजबूर हो के इस तरफ अपने नन्हे मुन्हे बच्चे को फेंक देते है। साथ ही साथ इससे बच्चे और परिवार का भी भरण पोषण आसानी से हो जाता है।
आपके साथ भी कभी यह हुआ होगा या फिर कभी हो सकता है कि आप अपनी मोटर साइकिल या फिर कार पर हों और आप के पास कोई नन्हा बच्चा प्यारी मुस्कान लिए हुए कहता है कि " बाबू जी १ रूपया दोना भूख लगी है खाना- खाना है " तब फिर मन में यही होता कि इसको दुत्कार दिया जाय या फिर आप जेब में हाथ डालकर एक सिक्के उसके हाथ पर रख देते हैं और वह मुस्कुराता हुआ अपने नये ग्राहक की तलाश में आगे बढ़ जाता है और न जाने ऐसे कितने लोगो से यही डायलाग दिन भर कहता है । कितनी हया और कितना निर्लज्जपन आ जाता है इनमें या फिर एक तरह का डर क्योंकि इनका भी एक निर्धारित लक्ष्य होता है जिसको दिन भरमें हासिल करना होता है नही तो अपने पेट से काट के दें पैसे ।
इस तरह की बुराईयां हमारे आसपास ही पल रही है। और हम सब इसको नजरंदाज कर देते हैं। जो कि एक युवा और पढ़लिखे समाज के लिये शर्म की बात है। आखिर इन सब को, इस सबसे कब निजात मिलेगी बात मैं मेट्रों सिटी दिल्ली की करता हूँ यहाँ तो समाज शिकक्षित है फिर भी यहाँ पर ही यह धन्धा जोरों पर हैं । क्या यहां कि सरकार इस पर नजर नहीं रखती या फिर जानबूझ कर आखों पर पर्दा डालें हुए है। पर मेरा आप सभी युवाओं से अनुरोध है कि इस समाजिक बुराई को दूर करने के लिए आगे आईये। आखिर कब तक हम मुह को छिपा कर अधेरें में बैठे रहेगें।

1 comment:

संजय तिवारी said...

सूचनाओं और आंकड़ों को आधार बनाईये. यह आपके काम और कैरियर दोनों के लिहाज से अच्छा होगा. आप संवेदनशील हैं इसमें दो राय नहीं लेकिन टहलते घूमते कुछ लोगों से बात करके रिपोर्ट बनाईये, आपकी रिपोर्ट में ही आपके विचार समाहित होने चाहिए.