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Saturday, April 11, 2009

टूटते रिश्ते अब तलाक तक - स्त्री विमर्श ,कितना सही ? कितना गलत ?

भारत में वैवाहिक जीवन अन्य देशों की तुलना में बहुत मजबूत है , प्रेम ही पति पत्नी को एक दूसरे से जीवन के अंतिम समय तक का साथ निभाता है, हमारे यहां की परम्पराये विश्व के अन्य देशों की तुलना में बहुत ही मजबूत हैं। पर समय के साथ ही साथ वैवाहिक जीवन में कहीं न कहीं पर कुछ दूरियां आयी है। जिसका परिणाम होता है अलगाव या फिर तलाक। पश्चात्य परम्परा से ही कहीं न कहीं हम भी प्रभावित हुए है।
पति-पत्नी का रिश्ता हमारे यहां सबसे मजबूत रिश्तों में एक है, और इस रिस्ते में आये विखराव से न केवल पति पत्नी ही प्रभावित होते है बल्कि सबसे ज्यादा बुरा प्रभाव बच्चों पर होता है । ऐसा नहीं है कि यदि कोई पुरूष अपनी पत्नी का शोषण कर रहा हो तो वहां पर तलाक लेना गलत होगा पर आम बात जो कि आपस में मिल बैठकर सुलझायी जा सकती है उस पर तलाक तर्क संगत नहीं है।

और क्या तलाक होने के बाद स्त्री खुश रह पाती है , और क्या एक अच्छा जीवन जी पाती है तो शायद बिल्कुल नहीं , वैसे पुरूष प्रधान भारतीय समाज में आज भी स्त्री की दशा अच्ची नहीं है पर फिर भी तलाक इसका इलाज नहीं है। अमेरिका में कुछ ही समय में शादियां टूर जाती है जिसका परिणाम होता है बिना पिता के बच्चे । शायद यहां पर महिलाएं खुद के बर्चस्व को भी प्राथमिकता देती है वैसे यह गलत नहीं पर जरा सा अपने को अलग कर सोचे तो तलाक लेने का विचार कितना सही है यह खुद ही समझ में आयेगा।

10 comments:

रचना said...

no relationship is made single handly and no relationship breaks because of one person .

the onus of keeping the marriage alivc in indian society rests solely on woman and with woman becoming economically independent they want equal responsibilty in keeping the marrige alive

tha problem is not divorce the problem is to live with a husband who has been conditioned to belive that because he is man he has a right to do what he wants

हिन्दी साहित्य मंच said...

भारत में तलाक की समस्याएं दिन ब दिन बढ़ रहीं है , इससे सामाजिक स्तर में गिरावट हो रही है , अविश्वास बढ़ रहा है । कहीं न कहीं पश्चिमी सभ्यता का बुरा प्रभाव पड़ रहा है हमारे ऊपर ।

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

तलाक का मुख्य कारण है एक दूसरे के विचारो में एका साम्यता न होना .

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

बदलते परिवेश में सफल वैवाहिक जीवन के लिए स्त्री पुरुष दोनो एक दूसरे को स्पेस दें, यह बहुत जरूरी है। स्त्रियाँ यदि स्वावलम्बी (आर्थिक) बनें तो उनका शोषण बन्द हो सकता है। लेकिन यह बहुत सरलीकृत व्याख्या है। नौकरीशुदा महिलाएम भी शोषण का शिकार होती हैं। समस्या का समाधान पुरुषों में भी नैतिकता और संस्कारों की शिक्षा का प्रसार करने और महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति सजग रहते हुए परिवार बनाने के लिए दोनो के बीच अन्योन्याश्रित सम्बन्ध स्थापित करने की सीक देना चाहिए। धन कमाने को महिमा मण्डित करने और परिवार में बच्चों की देखभाल व घर की रसोई सम्हालने को न्यूनतर कार्य समझने की गलती किसी से नहीं होनी चाहिए।

Anil said...

मुझे लगता है कि आपने बिल्कुल ठीक कहा। कुछ लोगों को तलाक जायज वजहों से लेना पड़ता है (शादी ही बेमेल हुयी हो तो कैसे निभायें)। लेकिन बहुतायत पश्चिमी देशों में तलाक वे लोग लेते हैं जो समस्याओं का समाधान नहीं निकाल पाते, इसलिये उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। तलाक वे लोग लेते हैं जिनमें धीरज की कमी होती है। वैसे ही जिंदगी इतनी छोटी है, तलाक से हम महत्त्वपूर्ण समय खो देते हैं।

prabhat gopal said...

bat sochne wali hai

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

तलाक के सभी पहलुओं को
कम शब्दों में उजागर करने
के लिए धन्यवाद।
अच्छा लेख है।

Manorma said...

कोई भी रिश्ता एक अकेले इंसान से नहीं बनता ...और ना ही एक अकेले इंसान कि वजह से आगे बढ़ता और टूटता ....चमक , भाग दौड़ ...हाई फाई चाहते ...रिश्तों को कमजोर कर देती हैं ...

आलोक सिंह said...

तलाक़ का प्रमुख्य कारण है तालमेल अक्सर मैंने देख है जो लड़का-लड़की प्रेम करते थे और प्रेमविवाह करते हैं . शादी से पहले बहुत खुश रहा करते थे , लेकिन शादी के बाद उनमे अक्सर लडाई झगडे होने लगते है नौबत तलाक की आ जाती है . मुझे लगता है की फर्क सोच का पड़ता है शादी से पहले जो लड़का, लड़की की हर बात मानता था वो शादी के बाद खुद को एक पति की तरह बर्ताव करता है . मतलब अब वह पत्नी की सही बातों को भी मानने से मना करने लगता है .जिससे लड़की को मानसिक आघात लगता है और नौबत तलाक तक पहुँच जाती है .बाकि पश्चात्य परम्परा से कहीं न कहीं हम भी प्रभावित हुए ही है जो तलाक़ को नजदीक ला देता है .

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

शादियाँ टूट जाती हैं जिस का परिणाम होता है बिना पिता के बच्चे।
आप की यह पोस्ट यह सिद्ध करती है कि विवाह का अस्तित्व केवल संतान का पितृत्व स्थापित करने के लिए ही है।
अब प्रश्न यह है कि क्या संतान का पितृत्व स्थापित होना आवश्यक है? और क्या विवाह संस्था भी आवश्यक है।