जन संदेश

पढ़े हिन्दी, बढ़े हिन्दी, बोले हिन्दी .......राष्ट्रभाषा हिन्दी को बढ़ावा दें। मीडिया व्यूह पर एक सामूहिक प्रयास हिन्दी उत्थान के लिए। मीडिया व्यूह पर आपका स्वागत है । आपको यहां हिन्दी साहित्य कैसा लगा ? आईये हम साथ मिल हिन्दी को बढ़ाये,,,,,, ? हमें जरूर बतायें- संचालक .. हमारा पता है - neeshooalld@gmail.com

Wednesday, April 8, 2009

मेरा शहर और यहां के लोगों का कारनामा आपके सामने ? आखिर क्या क्या गलत है इसमें ये आप बताइये ? रिश्ता बनाम सोच का मामला ।

कभी कभी कुछ ऐसी बातें हो जाती हैं जिससे मन बहुत दुखी होता है और देखा जाय तो बात बहुत ही साधारण या कुछ नहीं होती है हाल--दास्तान मैं आज आपके सामने रखता हूँ मैं मास मीडिया का स्टूडेंट हूँ , अभी कुछ ही दिन हुए नोएडा में किराये पर कमरा लिये हुए (करीब एक महीने लगभग) मेरे क्लास में कुल पढ़ने वाले बच्चे हैं २० जिसमें से लड़के और १५ लड़कियां हैं ।तो इस वजह से जो दोस्त हैं उनमें लड़कियों की संख्या ज्यादा है करीब एक हफ्ते पहले ही मेरी एक दोस्त(लड़की ) मेरे ही मुहल्ले में रूम खोजने आयी इत्तेफाक से हमारू मुलाकात हो गयी वह आश्चर्यचकित थी मुझे देख उसने पूछा यहां कैसे ? मैंने भी पूछा - तुम यहां कैसे ? बोली यार रूम बदलना था तो सर्च कर रही हूँ मैंने कहा- मैं भी इसी मुहल्ले में ही रहता हूँ फिर वह मेरे कमरे पर आयी काफी बातें हुई उसने कहा कोई रूम यार अगर खाली हो आसपास तो बताओ ? मेरे मुहल्ले में एक रूम खाली हुआ था मैंने उसे दिखाया और वह उसे पसंद आया मकान मालकिन से बात पक्की हुई कमरे की एड़वांस दे दिया गया और कल रूम शिफ्ट करेंगें यह कहा गया


वह मेरे मुहल्ले में गयी मेरी दोस्त के साथ हमारी सीनियर ( रेडियो जाकी हैं ) भी रहती हैं कमरे पर मेरे नेट है तो ऐसे में वह कभी कभी एक दो घण्टे के लिए जाती है आज हमारे क्लास की दो और लड़किया मिलने आयी थी कुछ ही समय बीता रहा होगा ( १० मिनट तक ) हम एक जाब के लिए फार्म भर रहे थे तभी कमरे पर मेरे पास के कमरे में रहने वाले लोग आकर कहने लगे आप लोग कैसे यहां ? मेरी दोस्त एकाएक इस प्रश्न से चौंक सी गयी ? मैं बाहर निकला मैं कहा कहिये क्या बात है? उन महाशय ने कहा कि यह अच्छा नहीं कर रहे हैं मैंने कहा क्या अच्छा नहीं कर रहे हैं बताईये ? महाशय ने कहा मैं माकन मालिक से बात करता हूँ अभी मैंने कहा बिल्कुल करिये ? हम सभी दोस्त कमरे से बाहर निकले कुछ दूर मैं उन सभी को छोड़ अपने कमरे पर गया ( उन सभी को आईबीएन में जाना था तो चली गयी ) मैं काफी देर सोचता रहा कि क्या आखिर यही सोच हैं आज भी इस शहर की कहने को विकसित और प्रगतिशील पर उदाहरण एकदम उल्टा ( कुछ देर बाद मेरी दोस्त फोन कर कहती है कि निशांत " नीशू" आराम से रहना अब हम नहीं आयेगें ठीक है और कोई बात हो तो बताना ). पढ़े लिखे लोग की मानसिकता की एक झलक से मुझे परेशानी और दुख भी है ये सभी लोग बी.टेक और इसी तरह की उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं अब इनसे क्या इस तरह की उम्मीद की जानी चाहिए ? सवाल और भी कई हैं पर जवाब नहीं हैं एक के भी

11 comments:

हिन्दी साहित्य मंच said...

नीशू बहुत ही दुखद बात है कि आज के लोग पढ़ लिख लेने के बाद भी अपनी दकियानूसी सोच से उबर नहीं पाये हैं । किसी भी रिश्ते को देखने का तुच्छ नजरिया दिखा यहां । जो कि बेहद घटिया सोच को प्रदर्शित करता है । इतनी उच्च शिक्षा का कहीं कोई प्रभाव नहीं दिखता । ऐसी घटनाएं प्रदर्शित करती हैं असली तस्वीर भारत की ।

आलोक सिंह said...

मालिक ठीक भवा की पडोसी आई के कुछ बोल गयेन, पुलिस के फ़ोन कइके नहीं बोलायेन . वैसे एक बात त बा अगर लाइका के कमरा पे लइकी आयिहें त मोहल्ला वाले के खटकबे करे . और एक बात जेतना ज्यादा पढ़ा लिखा मनई होत है ओकर सोच ओतने छोट होत है .

neeshoo said...

हां आलोक भईया अब लागत बा इयह बाकी बा पुलिसया आई जा । कुछ कुछ तोहरे पुरानी पोस्ट जैइसेन भवा हियऊ । अब का कहा जाय बतावा

अनिल कान्त : said...

फर्क मानसिकता का है ....सोच तो ज्यादातर ऐसी ही है

सुशील कुमार छौक्कर said...

नीशू जी बस नजरों का हेरफेर है। जिसकी जैसी नजर वो वैसा ही देखता है।

रेवा स्मृति said...

Actually hamlog education or literacy ko differentiate karne mein galti karte hain. Akshar bodh ya koi bhi Degree sirf literacy rate ko jahir karta hai...education ke value ko nahi. Educated person to ek murkh bhi ho skata hai jise akshar gyan nahi hone ke bawjood apni soch or unnat maansikta se educated paya jata hai! Isliye ab hame educated or litercy ke beech ke bhinnta ko pahchanna jaruri hai!

Shukriya.
www.rewa.wordpress.com

Kapil said...

नीशू अपने दुख का सामाजीकरण कर लो, इसका कारण और खत्‍म करने का रास्‍ता भी समझ आने लगेगा।

संगीता पुरी said...

इस दुनिया में हर प्रकार के लोग होते हैं ... अलग अलग प्रकार की सोंच और कर्म करनेवाले ... सबकी चिंता छोड अपने कम पर ध्‍यान देना चाहिए।

Anil Pusadkar said...

अफ़सोस इस बात का है कि पढे-लिखे लोग ऐसा सोचते हैं।

cmpershad said...

आप मकान मालिक से मिलकर परिस्थिति समझा दें। और एक बात का ध्यान रखें कि अधिक शोर शराबा न हो। यह स्वाभाविक होता है कि जब हम उम्र लोग मिलते हैं तो बिंदास बातचीत होती है और मुहल्ले वाले गलत अर्थ लगा लेते है। जब ऐसे मुहल्ले में रह रहे हैं तो सावधानी बरतनी होगी ही।
यह सही है कि अपने सहपाठियों के साथ समय बिताना कोई गलत नहीं है।

Pratik Maheshwari said...

नीशू एक बात बताओ.. जो बन्दा यह कहने आया था.. क्या वह शिक्षित था ? अगर हाँ, तो काफी दुःख की बात है.. अगर नहीं, तो ज़रूरत है उसे शिक्षा की..
खैर एक बात बता दूं.. हमारे कॉलेज में 11 बजे के बाद लडकियां अपने हॉस्टल से बाहर नहीं आ सकती हैं..
कभी कभी हम भी सोचते हैं कि ऐसा क्यों ? आखिर हम सब तो पढ़े लिखे हैं..
पर मानोगे नहीं.. कुछ ऐसी बातें अक्सर सुनने में आती है... जो यह कहने पर मजबूर कर देता है.. क्या पढ़े लिखे लोग भी ऐसा कर सकते हैं ?..
हम सबकी मानसिकता अलग-अलग है.. शायद जो बात हमारे लिए गलत हो, किसी और के लिए सही..
तो मेरे ख्याल से जो हमें सही लगे.. वो ही करो.. दुनिया को मारो गोली...
दुनिया गम देने के लिए बैठी है.. देखने है हम कितना लेते हैं..

खैर मैं आपके मेल का उत्तर जल्द दूंगा.. अभी व्यस्त हूँ फिलहाल..

शुभकामनाएं...