जन संदेश

पढ़े हिन्दी, बढ़े हिन्दी, बोले हिन्दी .......राष्ट्रभाषा हिन्दी को बढ़ावा दें। मीडिया व्यूह पर एक सामूहिक प्रयास हिन्दी उत्थान के लिए। मीडिया व्यूह पर आपका स्वागत है । आपको यहां हिन्दी साहित्य कैसा लगा ? आईये हम साथ मिल हिन्दी को बढ़ाये,,,,,, ? हमें जरूर बतायें- संचालक .. हमारा पता है - neeshooalld@gmail.com

Monday, April 13, 2009

उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब मायावती कहां सो गयी हैं - आखें मूंदने से काम न चलेगा.........देखों देखों

उत्तर प्रदेश एक मात्र ऐसा राज्य हैं यदि यहां से किसी पार्टी को कम सीटें मिलती है तो उसका केन्द्र में सरकार बनाने का सपना अधूरा ही रह जायेगा । उत्तर प्रदेश की राजनीति अन्य प्रदेशों की तुलना में अधिक जातिवादी और तु्च्छ हैं । कुर्सी के लिए जान तक कुर्बान करते हैं और जान लेते हैं । सबसे ज्यादा बाहुबली नेताओं का गढ़ है उत्तर प्रदेश । चाहे बात करें राजा भैया ( विधायक कुण्डा से ) , या फिर अतीक अहमद ( फूलपुर से सांसद ) , अंसारी समेत एक बढ़कर एक माफिया की दुनिया के धुरंधर है । कोई किसी से कम नहीं । अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए अगर किसी प्रत्याशी की जान भी लेनी पड़े तो इशारों में यह खेल हो जाता है । पूर्वी उत्तर प्रदेश में प्रशासन का अस्तित्व इन बाहुबलियों के हाथ होता है । क्या होगा ,? कैसे होगा ? कब होगा ? यह सब यही महानिभाव तय करते हैं । सरेआम हत्या होती है पर एक भी गवाह न हीं मिलता तो आप अंदाजा लगा सकते है कि जनता में कितना भय है इनके प्रति ।

तो इस तरह से हर बार दो चार उम्मीदवारों को जान से हाथ धोना पड़ता है । केश दर्ज होता जरूर है पत अनाम व्यक्ति के ऊपर । फिर बाद में फाइल दब जाती है । हाल की घटना ले लिजिये । जौनपुर सीट से उम्मीदवार ' बहादुर सोनकर ' की हत्या कर बबूल के पेड़ पर टांग दिया गया ।हत्या का आरोप बाहुबली बहुजन समाजवादी पार्टी के नेता धंन्जय सिंह पर है । बहादुर सोनकर को बनारस से ५० किलोमीटर दूर जौन पुर में उनके गांव के पास मिला शव मिला । ऐसी कई वारदातें अभी और भी हो सकती हैं । खेल अभी बाकी है ।

मायावती ने चुनाव में यह वादा किया था कि खुफिया राज खत्म करेंगी (जिससे पार्टी सत्ता में आयी )। लोकतंत्र की हत्या का सररआम होना और इन्ही में से हमें चुनना है देश को चलाने वाला प्रतिनिधि । किस पर विश्वास किया जाये सभी तो नकाब में अपना सर ढ़के हुए है । आखिर मायावती अब क्यों पत्रकार सम्मेलन नहीं बुलाती हैं और जोर जोर अपनी आवाज बुलंद नहीं करती हैं । कहना ही इन नेताओं का काम है और हम मजबूर हैं इनके सुनने के लिए , इनकी काली करतूतों को देखने के लिए । कोई आवाज उठायेगा तो यही हश्र होगा । हाय रे राजनीति सभी हदें पार कर गयी है ।

4 comments:

हिन्दी साहित्य मंच said...

अब मायावती नहीं बोलेगी कुछ , वरूण के मामले पर बहुत उछल कूद मचाये हुए थी । चुनाव के लिए जो वादा किया था गुंडा राज वह तो और भी बिकराल रूप ले रहा है । कहां है प्रशासन जिसका गुणगान करते माया थकती ही नहीं

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

मुश्किल यह है कि जनता किसे चुने. चारों तरफ़ एक से बढ़ कर एक लोग हैं. कहीं नागनाथ है तो कहीं सांपनाथ हैं. इनमें से ही उसे चुनना है. मायावती नहीं तो मुलायम या कोई और. 60 वर्षों से हम एक खानदान का शासन झेलते आ रहे हैं, यह कौन सा लोकतंत्र है? पूरे देश की स्थिति एक जैसी है.

आलोक सिंह said...

मरो या मारो पर दिल्ली की कुर्सी पर किसी तरह पहुंचा दो यही सन्देश है मायावती जी का अपने प्रत्याशीयों से .
यु पी का शासन भोग लिया अब दिल्ली का देखना है . मायाराज है जो हो जाये कम है .

महामंत्री - तस्लीम said...

सबके अपने चक्षु हैं सबके अपने रोग।
----------
तस्‍लीम
साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन