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Sunday, February 1, 2009

समयचक्र

सूरज की धूमिल किरणें
जब पड़ती हैं मुख पर
पीलापन लिये नजर आती हैं
शांत हो जाता है चंचलमन
ये प्रतीक है गोधूलि के
रात के आने का
नयी शुरूआत का
अंत देता है सदैव
नयापन, नया युग
बदलाव की दिशा
प्रारम्भ से अंत है
यही नियम है
यही चक्र है
यही नियति है
समय की
ब्रम्हाण्ड की भी ।

3 comments:

अविनाश वाचस्पति said...

समयचक्र
या
वसंतचक्र
आया है
जिसने घुमाया
है, ठीक से
ही घुमाया है।

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

भाई बढ़िया कविता लिखी है समयचक्र . आभार

विवेक सिंह said...

क्या दार्शनिकों जैसी कविता लिख डाली जी !

बहुत बढिया !