
यूनिसेफ सर्वे से पता चला है(२००६) कि भारत की जी डी पी में बाल मजदूरी से साढें तीन प्रतिशत आता है और यह कुल मजदूरी का सत्रह प्रतिशत है।
चाय की दुकान पर प्लेट साफ करता रामू, ट्रैफिक जाम के बीच टाइम पत्रिका बेचता हुआ श्याम और कूडे में से काम की चीजें उठाती हुइ गुडिया। क्या यही है अतुल्य भारत।
बाल मजदूरी अधिनियम कानून से मात्र भारत के भविष्य की दशा में सुधार नहीं होने वाला है बल्कि सरकार को इनके विकास एंव उत्थान के लिए स्थाई कार्यक्रम निर्धारित करना होगा । माना की अब १४ वर्ष से कम उम्र के बच्चों से काम लेना कानूनी अपराध होगा पर क्या किया जाय कि इन बच्चों के हाथ मे काम की जगह किताब और पीठ पर कचरे की जगह स्कूली बैग हो।
केवल कानून बनाने से समस्या हल का नहीं होने वाला है पूरे दिन काम करके ये बच्चे मात्र १५ से २० रूपये प्रतिदिन से ज्यादा नहीं कमा पाते जो कि उनके भोजन के लिए भी पर्याप्त नही होता है अतः यहाँ पर विचारणीय है कि है कि समस्या से छुटकारा कैसे पाया जाय? कानून न केवल पन्नों तक ही न हो बल्कि उसका क्रियान्वयन भी होना चाहिये ताकि बच्चों के साथ-२ भारत का भी भविष्य उज्जवल हो
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