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Monday, August 20, 2007

मैथिल कोकिल कवि - विद्यापति

मैथिल कोकिल कवि - विद्यापति

हिन्‍दी साहित्‍य के अभिनव जयदेव के नाम से विद्यापति प्राख्‍यात है। बिहार मे मिथि‍ला क्षेत्र के होने के कारण इनकी भाषा मैथिल थी। इनकी भाषा मैथिल होने के बावजूद़ सर्वाधिक रचनाऐ संस्‍कृत भाषा मे थी, इसके अतिरिक्‍त अवहट्टा भाषा मे रचना करते थे। विद्यापति के जन्‍म के सम्‍बन्‍ध मे विद्वानों मे मतभेद है, कुछ तो इन्‍हे दरभंगा जनपद के विसकी नामक स्‍थान को मानते है। विद्यापति का वंश ब्राह्मण तथा उपाघि ठाकुर थी। विसकी ग्राम को इनके आश्रय दाता राजा शिवसिंह ने इन्‍हे दान मे दिया था। इनका पेरा परिवार पैत्रिक रूप से राज परिवार से सम्‍बद्ध था। इनके पिता गणपति ठाकुर राम गणेश्‍वर के सभासद थे। इनका विवाह चम्‍पा देवी से हुआ था। विद्यापित कि मृत्‍यु सनम 1448 ई0 मे कार्तिक त्रयोदशी को हुई थी।

विद्यापति ने मैथिल, अवहट्ट, प्राकृत ओर देशी भाषओं मे चरित काव्‍य और गीति पदों की रचना की है। विद्यापति के काव्‍य में वीर, श्रृंगार, भक्ति के साथ-साथ गीति प्रधानता मिलती है। विद्यापति की यही गीतात्‍मकता उन्‍हे अन्‍य कवियों से भिन्‍न करती है। जनश्रुति के अनुसार जब चैतन्‍य महाप्रभू इनके पदों को गाते थे, तो महाप्रभु गाते गाते बेहोश हो जाते थे। भा‍रतीय काव्‍य एवं सांस्‍कृतिक परिवेश मे गीतिकाव्‍य का बड़ा महत्‍व था। विद्यापति की काव्‍यात्‍मक विविधता ही उनकी विशेषता है।

विद्यापति संस्‍कृत वाणी के सम्‍बन्‍ध मे टिप्‍पणी करते हुये कहते है‍ कि संस्‍कृत भाषा प्रबुद्ध जनो की भाषा है तथा इस भाषा से आम जनता से कोई सरोकार नही है प्राकृत भाषा मे वह रस नही है जो आम आदमी के समझ मे आये। इ‍सलिये विद्यापति अपभ्रंश(अवहट्टा) मे रचनाये करते थें। अवहट्ट के प्रमाणिक कीर्ति लता और कीर्ति पताका है।

विद्यापति की तीनो भाषओं की रचनाऐ निम्‍नलिखित है-
1)-- अवहट्ट - कीर्तिलता और कीर्तिपताका।
2)-- संस्‍कृत-- मणिमंजरी, पुरूष परिक्रमा, वर्णकृत्‍य भूपरिक्रमा, पुरूषपरीक्षा, लिखनावली, दुर्गाभक्ति तंरगणिनी, गंगा वाक्‍यपली, दान वाक्‍यली, गया पत्‍तलक, व्‍याड़ी भक्ति तरंगणी।
3)- गोरक्षविलय, पदावली।

''देसिल बयना सब जन मिठ्ठा '' उक्‍त पक्तिं के अनुसार वि़द्यापति के अनुसार उन्‍हे अपनी भाषा मे भावो को व्‍यक्‍त्‍ा करना अनिवार्य था, उसकी पूर्ति के उन्‍होने पदावली मे की। पदावली की भाष मैथिल है जिस पर ब्रज का प्रभाव दिखता है। मिथिला कि प्राचीन भाषा ही उसकी 'देसिल बयना' है। विद्यापति ने उसे स्‍वयं भी मैथिल भाषा नही कहा है। विद्यापति की यह पदावली कालान्‍तर मे पूर्वोत्‍तर भारत बंगाल मे प्रचलित हो चुकी थी। विद्यापति का प्रभाव उनके उत्‍तराधिकारी सूर पर भी पडता है।

विद्यापति द्वारा रचित ''राधा-कृष्‍ण'' से सम्‍बन्धित मैथिल भाषा मे निबद्ध पदों का संकलित रूप विद्यापति पदावली के नाम से विख्‍यात है विद्यापति के पदों का संकलन जार्ज गिर्यसन, नरेन्‍द्र नाथ गुप्‍ता, रामवृक्ष बेनी पुरी, शिव नन्‍दन ठाकुर आदि विद्वानों ने किया हैं। विद्यापति के पदों मे कभी तो धोर भक्तिवादिता तो क‍भी घोर श्रृंगारिकता दिखती है, इन्‍ही विभिन्‍नतओं के कारण विद्यापति के विषय मे यह भी विवाद है कि उन्‍हें किा श्रेणीके कवि मे रखा जाये। कुछ कवि तो उन्‍हें भक्त कवि के रूप मे रखनें को तैयार नही थे। विद्यापति द्वारा कृष्‍ण-राधा सम्‍बन्‍धी श्रृंगारी पद उन्‍हे भक्ति श्रेणी में रखने पर विवाद था। विद्वानों का कहना था कि विद्यापति भी रीतिकालीन कवियों की भातिं रा्जाश्रय मे पले बड़े हुये है इसलिये उनकी रचनाओं मे श्रृंगार प्रधान बातें दखिती है। इसलिये इन्‍हे श्रृंगार का कवि कहने पर बल दिया गया है।

विद्यापति के सम्‍बन्‍ध में एक बात प्रमुख है कि उनके पद्यों में राधा को प्रमुख स्‍थान दिया गया है। उसमे भी नख-शिख वर्णन प्रमुख है। विद्यापति के काव्‍य की तुलना सूर के काव्‍य करे तो यह प्रतीत होता है कि सूर ने राधा-कृष्‍ण का वर्णन शैशव काल मे है तो विद्यापति ने श्रीकृष्‍ण एवं राधा के वर्णन तरूणावस्‍था का है जिससे लगता है कि विद्यापति का उद्देश्‍य भक्‍त का न होकर के श्रृंगार का ही हैं।

भक्‍त की दृष्टि से अगर विद्यापति के काव्‍य को देखा जाये तो यह देखने को मिलता था कि तत्कालीन परिवेश एवं परिस्थितियों के कारण उनका भाव श्रृंगारिक हो गया हैं। विद्यापति के पदों को अक्‍सर भजन गीतों के रूप मे गाया जाता रहा है। विद्यापति ने राधा-कृष्‍ण का ही नही शिव, विष्‍णु राम आदि देवताओं को विषय मानकर रचनाऐ की है। विद्यापति द्वारा रचित महेश भक्ति आज भी उड़ीसा के शिव मन्दिरों मे गाई जाती है। दैव प्रचीन ग्रन्‍थवली के अनुसार भक्‍त अपने आराध्‍य को किसी भी रूप मे पूजा कर सकता है, इस आधार पर विद्यापति भक्त कवि भी सिद्ध होते है।

विद्या‍वति के पद्य :---
1
देख-देख राधा रूप अपार,
अपरूष के बिहि आनि मिराओल,
खिति तल लावण्‍य सार,
अगहि अंग अनंग मुरझायत
हेरय पड़य अधीर।

2
भल हरि भल हर भल तुअ कला,
खन पित बासन खनहि बद्यछला।
खन पंचानन खन भुज चारि
खन संकर खन देव मुरारि
खन गोकुल भय चराइअ गाय
खन भिखि मागिये डमरू बजाये।

3
कामिनि करम सनाने
हेरितहि हृदय हनम पंचनाने।
चिकुर गरम जलधारा
मुख ससि डरे जनि रोअम अन्हारा।
कुच-जुग चारु चकेबा
निअ कुल मिलत आनि कोने देवा।
ते संकाएँ भुज-पासे
बांधि धयल उडि जायत अकासे।
तितल वसन तनु लागू
मुनिहुक विद्यापति गाबे
गुनमति धनि पुनमत जन पाबे।

महाशक्ति-मीडिया व्‍यूह समझौते के अर्न्‍तगत यह लेख महाशक्ति से लिया गया है।

2 comments:

संजय तिवारी said...

बहुत अच्छा प्रयास.

Mired Mirage said...

यह सब बहुत ही अच्छे ढंग से बताने के लिए धन्यवाद ।
घुघूती बासूती