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Wednesday, May 13, 2009

आज रोई नहीं तू अबला .....

रोयी हुई तू आज है अबला,
खुद से लड़कर हारती है क्यों भला ?

जिसको दिया तुमने जन्म ,
करता है वो ही मान मर्दन ,

तू ही तो है विधाता इस जहां की,
कर भी ले तैयार खुद को ,

लड़ना तो होगा तुझे एक दिन,
अस्त्र तेरा खुद है तू जान ले ,

ममता की गठरी सदा है साथ ही,
मर्म स्पर्श में है प्यार सदा तेरे ,

ये बने न पैर की अब बेड़िया ,
तोड़कर खड़ित कर दे दीवार तू,

है समय की मांग में बदलना तुझे,
अब नहीं सहना , सिसकना तुझे ,

कर अब विश्व में हुंकार तु,
वार से अपने देगी हार तू , हार तू ।।

आज रोई नहीं तू अबला .....

8 comments:

हिन्दी साहित्य मंच said...

आपकी यह रचना स्त्री दशा को सुन्दरता से इंगित करती है साथ ही साथ व्यथा को भी । सुन्दर रचना के लिए आभार ।

निरन्तर- महेन्द्र मिश्र said...

बहुत सुन्दर प्रेरक रचना . बधाई.

विनय said...

बहुत बढ़िया रचना है

SWAPN said...

bahut badhia. badhai.

रंजना said...

सुन्दर भावपूर्ण रचना..

priya said...

bahut hi sunder rachna

shiv said...

neeshoo ji , nari per aap ne sunder racna likhi hai . badhai

annu said...

bahut khub