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Sunday, November 4, 2007

बीच सफर में

आने का समय न मिला,
या
बहाना था न मिलने का,
जब दूर रहना ही था
तो पास आना ही न था,
आखिर क्यों?
करते हो ये झूठी बातें ,
तुम भी समझते होअपने इरादे,
आज बोल ही दो सच्चाई को तुम,
कब तक करते रहोगे ये झूठे वादे,
पता है मुझको कि जाना चाहते हो दूर मुझसे,
ये,,,,,समय -समय का बदलाव ही तो है ,
कभी हम अन्जान न हुआ करते थे ऐसे,
वो दिन याद आता है
आखों आसूँ से छलक जाते है खुद-ब-खुद
कम से कम कोई तो साथ है मेरे।
ये तुम्हारी तरह नही हैं जो कि साथ छोड़ जायेगे, बीच सफर में।

2 comments:

बाल किशन said...

अच्छी कविता लिखी आपने. धन्यवाद.

preeti said...

जनाब ऐसा ही होता है आखिर सफ़र है,
कहीं न कहीं खत्म तो होना ही था
वादा हर कोई कर लेता है निभाना सबके बस की बात नहीं प्यार का दर्द हर किसी को नसीब नहीं होता इसमें निराश होने की कोई बात नहीं
ख़ुदा के प्यारे बन्दे हो तुम फिर किस बात का है तुम्हें ग़म
मत हो किसी के कारण निराश
ज़रा देखो उस आकाश की ओर
धरती से प्यार उसे भी है
वो कभी एक नहीं हो सकते
लेकिन इस कारण वे निराश नहीं होते.......

प्रीति मिश्रा :)