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Saturday, September 26, 2009

शाम - - - कविता

शाम की छाई हुई धुंधली

चादर से

ढ़क जाती हैं मेरी यादें ,

बेचैन हो उठता है मन,

मैं ढ़ूढ़ता हूँ तुमको ,

उन जगहों पर ,

जहां कभी तुम चुपके-चुपके मिलने आती थी ,

बैठकर वहां मैं

महसूस करना चाहता हूँ तुमको ,

हवाओं के झोंकों में ,

महसूस करना चाहता हूँ तुम्हारी खुशबू को ,

देखकर उस रास्ते को

सुनना चाहता हूँ तुम्हारे पायलों की झंकार को ,

और

देखना चाहता हूँ

टुपट्टे की आड़ में शर्माता तुम्हारा वो लाल चेहरा ,

देर तक बैठ

मैं निराश होता हूँ ,

परेशान होता हूँ कभी कभी ,

आखें तरस खाकर मुझपे,

यादें बनकर आंसू उतरती है गालों पर ,

मैं खामोशी से हाथ बढ़ाकर ,

थाम लेता हूं उन्हें टूटने से ,

और

चुप होकर मैं

फीकी मुस्कान लिये ,

वापस आ जाता हूँ ,

एक नयी शुरूआत करने ।। ,


6 comments:

अनिल कान्त : said...

वाह भाई क्या खूब कहा आपने इस रचना के माध्यम से....दिल के एहसास को बयाँ किया है

हिन्दी साहित्य मंच said...

कविता को सजीव कर दिया है आपने । बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति सरल शब्दों के माध्यम से । शुभकामनाएं

Mithilesh dubey said...

भाई वाह नीशू जी क्या बात है, आप ने अपने एहसास को लाजवाब तरीके से पिरो कर प्रस्तुत किया है। बहुत-बहुत बधाई

योगेश स्वप्न said...

sunder abhivyakti. badhai.

मोहन वशिष्‍ठ 9988097449 said...

वाह जी वाह कितनी सहजता से कितनी सरलता से आपने कविता में जान डाल दी बहुत खूब

nitin said...

bahut achi abhivakti hai bhawnaon ki badhai ho.....