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Sunday, December 2, 2007

आजा नच लै सरकार को मंजूर नही


एक दो तीन चार यह तेजाब वह गाना है जिसकी धुन ने सब को दीवाना कर दिया था।और साथ में माधुरी दीक्षित की लचकती कमर का जादू दर्शकों के सर चढ़कर बोलता था। जब ५ साल बाद इस अभिनेत्री ने अपने फिल्मी कैरियर में पुनः प्रवेश फिल्म " आजा नच लै" से किया तो दर्शको को वही पुरानी अपनी चहेती माधुरी की फिल्म का बेसब्री से इंतजार रहा लेकिन दर्शकों को सरकार ने मायूस किया । सिनेमा हाल के सामने दर्शको का जमवाडा़ देखने को मिला।
हुआ कुछ यूं कि इस फिल्म के एक गाने में " मोची " शब्द का प्रयोग किया गया है और लोगों में इसी का विरोध है कि यह किसी जाति विशेष को आहत करता है। जिसके चलते उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री ने फिल्म को प्रतिबंधित कर दिया। पर जब यह बात यश राज फिल्मस के अध्यक्ष यश चोपडा़ को पता चला तो उन्होंने कहा कि फिल्म में किसी जाति विशेष को नीचा दिखने का कोई उद्देश्य न था यह मात्र गलती थी । जिसकी मैं माफी मागंता हूँ। इस वक्तब्य के आने के बाद मायावती ने फिल्म से प्रतिबधं हटा लिया। लेकिन दूसरी तरफ एक नया संकट इस फिल्म पर आगया । हरियाणा और पंजाब सरकार ने भी फिल्म को अपने प्रदेशों में प्रतिबंधित किया हुआ है। अब देखना है कि कब यह प्रतिबंध कब हटेगा।
वैसे फिल्मों में यह कोई पहली फिल्म नहीं है जिस पर प्रतिबंध लगा हो। पर इससे फिल्म कंम्पनी को जरूर आर्थिक हानि उठानी पडी है।और साथ ही साथ सिनेमा के मालिकों को भी। अब देखना है कि राजनीति के जाल से यह फिल्म कब निकल पाती है। तब फिर से दर्शक माधुरी संग कह सकेंगें कि " आजा नच लै "।

1 comment:

preeti said...

मैं यहाँ किसी भी जाति या सम्प्रदाय की बात नहीं कर रही हूँ। मेरा मन था कि मैं अपना कुछ विचार प्रकट करूँ इसलिए मैं बस कुछ कहना चाहती हूँ। हम हर वक्त ये चर्चा करते रहते हैं कि हमारा देश और देशों से कब और कैसे आगे बढ़ेगा। अरे जिस देश के मंत्री सिनेमा और खेल जैसे विभाग में दख़्लन्दाज़ी करेंगे वो कैसे आगे बढ़ सकता है। आजा नच ले फिल्म में एक गाने में एक शब्द के कारण इतना बवाल मचाया गया। क्या फिल्म बनाने वाले ऐसी कोई भी बात कर सकते हैं जिससे जनता आहत हो?? उन्हें भी पता है कि जो जनता उन्हें इतना दुलार करती है उनकी भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचाना है। आखिर क्यों ये नेतागण मासूम लोगों के मन में जात-पात का ज़हर घोलते हैं। हमें तो यह ध्यान रखना चाहिए की मानवता से बड़ी कोई जाति नहीं होती है। जब आतंकवाद का हमला होता है तब जो खून बहता है उसमें जाति के हिसाब से खून नहीं बहता है। सबका खून लाल रंग का होता है। आखिर ये बातें क्यों लोगों को समझ नहीं आतीं। जैसे डॉक्टर,इंजीनियर,अध्यापक की पदवी होती है वैसे ही दुकानदार,बावर्ची,सुनार और मोची भी व्यावसायिक पदवी होती है। इसमें किसी जाति को कहाँ आहत किया गया है। दोस्तों हमें अपने विचारों में परिवर्तन लाना ही पड़ेगा तभी हम दूसरे देशों को टक्कर दे सकते हैं। ऐसे मौके पर कबीर जी का एक दोहा याद आता है : ”जे बाह्मन तू बाह्मणी का जाया
और राह ते काहे न आया।“ अर्थात् प्राकृतिक नियम सबके लिए एक जैसे होते हैं। मानवता में भेदभाव करने वाले हम ख़ुद ज़िम्मेदार हैं। अपनी इस हालत के ज़िम्मेदार केवल हम हैं और कोई नहीं। और राजनीतिक लोगो6 से भी ये अनुरोध है कि मनोरंजन जगत को तो अपनी राजनीति से दूर रखें।
प्रीति मिश्रा
सह संपादक