जन संदेश

पढ़े हिन्दी, बढ़े हिन्दी, बोले हिन्दी .......राष्ट्रभाषा हिन्दी को बढ़ावा दें। मीडिया व्यूह पर एक सामूहिक प्रयास हिन्दी उत्थान के लिए। मीडिया व्यूह पर आपका स्वागत है । आपको यहां हिन्दी साहित्य कैसा लगा ? आईये हम साथ मिल हिन्दी को बढ़ाये,,,,,, ? हमें जरूर बतायें- संचालक .. हमारा पता है - neeshooalld@gmail.com

Wednesday, May 26, 2010

सम्मेलन या गुटबाजी बनाम बेनामी का खुलासा ?? (कुछ तो हुआ ...).......................एक विचार

अभी कुछ दिन हुए इंटर नेशनल ब्लोगर सम्मलेन  को हुए ...........एक अच्छी पहल है इस तरह का आयोजन ........लेकिन इससे पहले का दिल्ली के लक्ष्मी नगर में ब्लोगर सम्मलेन हुआ था ....जिसको मैंने " खाने खिलाने " से ज्यादा कुछ भी नहीं समझा था ...ब्लोगर भाइयों  को यह बात ख़राब लगी ..पर सचे दिल से आज भी मैं उसी बात को सही पता हूँ ......दिल्ली ब्लोगर सम्मलेन के आयोजकों को बस यही बात ख़राब नहीं लगी बल्कि वे यहाँ तक उतारू हो गए की बेनामी से भी कमेन्ट करने से बाज नहीं आये ....कुछ प्रमुख बिन्दुओं को लिख रहा हूँ जिससे आयोजक भी इनकार नहीं कर सकते ....
१..............बेनामी कमेन्ट ....
मैंने कुछ दिन पहले लिखा था की " क्या मर रही है ब्लोगिंग ?एक विचार " पर  बेनामी से कमेन्ट आया की ....अजय जी ने पैसे खाए है...दूसरा यह की " सम्मलेन में रचना जी और अनूप शुक्ल जी भी आये थे ....जो मसिजीवी से ही मिल कर चले गये ? यह बात तो आजतक भी मुझे न पता चल पाई थी ...लेकिन लक्ष्मी नगर में हुए ब्लोगर सम्मलेन में रचना जी ओ अनूप शुक्ल जी आये तो यह बात सभी उपस्थित ब्लोगर से छिपाई क्यों गयी ?
दूसरा यह की  ( नाम न बताने की शर्त पर एक ब्लोगर जो की आयोजक के बहुत ही करीबी है ....उन्होंने बताया की रचना जी और अनूप जी के आगमन की बात ३ से चार ब्लोगर को ही पता थी )  अगर बेनामी से कमेन्ट आया तो इसका मतलब यह की वोह कमेन्ट करने वाले महाशय भी आयोजको में से ही हैं ...इसका मतलब की चोरी भी सीना जोरी भी ...वैसे जिसने किया वहहै वो समझ गये होगे ...अब आयोजक कौन थे ? ये आप खुद ही पता लगाईये ?
२.............सूचना ....
दुसरे इंटर नेशनल सम्मलेन में हमको और मिथिलेश दुबे जी को नहीं बुलाया गया .....वैसे ये तो आयोजक की इच्छा पर था ...मिथिलेश जी को भी कोई सुचना मिली .....हाँ बाद में रपट देख लिया था ...मिथिलेश जी ने तो कहा ...की भाई हम उस काबिल नहीं जो वह पर हमको बुलाया जाता ...बात वैसे सही भी है ...पर मिथिलेश भाई ने साफ कहा की चलो कम से कम गुटबाजी से बचे ..... दूसरी तरह यह भी कहता हूँ मैं की हमको तो बहिस्कृत किया गया ...इसमें किसी का दोष नहीं ...बस समय  ही ऐसा बना आया की ये तो होना ही था..
३...............चुपके चुपके ....
कुछ बात तो अब तक छिपी है लेकिन धीरे धीरे  ही सही पर बाहर आएगी ही .......वैसे विचार में समानता और असमानता ही हमको दोस्त और दुश्मन बनाती है ....  यानि नज़दीक और दूर करती है 
तो यहाँ भी आश्चर्य क्यों ???????

50 comments:

faij said...

laxmi nagar me jo sammelan hua tha usme rachna ji aayi thi ye toh kisi ne nahi bataya ..aur na hi kissi rapat me hi dikha ....ye baat kyun chhipayi gayi ...waise rachna ji ko bhi blogger sammelan me aane ka haq hai

माधव said...

nice

रच्ना said...

मै आयि और नीशु कि जेब् मे बैथि थि. औल अनुप उस्कि जब मे

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

यूँ तो आयोजक ही इस बारे मे कुछ बता सकते हैं...लेकिन चूंकि गलती से हमने भी उस सम्मेलन में भाग लिया था, सो इस लिए बता रहे हैं कि इस बात से हम भी पूरी तरह से अनभिज्ञ है...

अजय कुमार झा said...

प्रिय नीशू जी ,
हा हा हा , कितना बडा बडा खुलासा कर डाला आपने , बेशक इतने दिनों बाद ही सही । बताईये भला जो बात वहां उपस्थित इतने सारे ब्लोग्गर्स न जान पाए वो आपने झट से जान लिया । अब आपने खुलासा तो कर ही दिया है बस एक बार वे भी आकर कह दें कि हां यही सच था तो बस इसके बाद किसी के मन में कोई शंका नहीं रहेगी । आपको पिछली बैठक सिर्फ़ खाने पीने से ज्यादा नहीं लगी ये तो समझ में आ ही गया , चलिए अच्छा लगा कि कम से कम कुछ तो लगा ही , कम से कम खाना पीना तो ठीक था या उसमें भी कोई कमी थी तो अब भी बता देते । भविष्य में इसका पूरा ख्याल रखा जाता । आखिर हमने ठेका जो लिया हुआ है इसका । और पैसे जो लिए हुए हैं सबसे ....हा हा हा आपका भी कुछ बकाया हो तो अवश्य बताएं ।

अरे हां तो टिप्पणी तो आयोजक के गुट में से ही किसी ने की है न , पक्का न , अरे तो उस गुट में तो फ़िर आप भी थे न उस समय । क्या नहीं थे , । चलिए कोई बात नहीं । ओह शायद आपका ईशारा इस तरफ़ है कि वो टिप्पणी मैंने ही की हो । आखिर इन कामों से ही तो लोग मुझे भी जान सकेंगे इस ब्लोगजगत में क्यों है न ?

अब आपकी आखिरी बातों का जवाब । बिल्कुल जायज़ है आपका दुख ( अभी मिथिलेश जी का इसलिए नहीं कह सकता क्योंकि ऐसा आपने कहा है वे खुद भी यही कहें तो सोचूंगा ) इस बार आयोजकों ने जो बडे बडे कार्ड इस सम्मेलन के लिए भिजवाए थे वो उन्होंने आपको नहीं भेजा गलत किया ........और नहीं तो कम से बडी सी गाडी तो भेजी ही जानी चाहिए थी । और कमाल की बात ये है कि सम्मेलन के बाद आपको इसकी सूचना फ़ट से मिल गई जबकि उससे पहले लगाई गईं सभी पोस्टों पर आपकी नज़र तक नहीं गई । बडा ही दुखद रहा ये जानना । आप आते तो कुछ महीनों बाद ही सही ..........ऐसे ही कुछ खुलासे तो कर ही जाते । फ़िर भी मुझे खुशी है कि कम से कम आपने अपने मन की बात खुल कर तो कही । यही ब्लोग्गिंग का दस्तूर है । इसलिए आपसे प्रेरणा पाकर आज मैं भी कुछ ज्यादा ही लिख गया । मगर अलग से एक पोस्ट लिखने से बेहतर तो यही लगा मुझे । भविष्य के लिए शुभकामना ।

Vivek Rastogi said...

बहुत बड़ा खुलासा किया गया है आज ये समाचार तो ब्रेकिंग न्यूज के तौर पर सभी समाचार चैनलों में चल रही है।

हरि शर्मा said...

ना तो पीने का सलीका ना पिलाने का सऊर
ऐसे भी लोग चले आये है मय्खाने मे
(नीरज)

॒ बेटा निशू -
ना तो लिखने का सलीका ना टीपने का सऊर
ऐसे भी लोग चले आये है ब्लोगखाने मे
(हरि शर्मा)

राजीव तनेजा said...

ओ बेट्टे...ये तो बहुत्त बड़ा खुलासा कर दिया आपने कि उस सम्मलेन मे रचना जी और अनूप शुक्ल जी भी आये थे ....जो मसिजीवी से ही मिल कर चले गये...
अब यही बात आप उन तीनों के मुखारविंद से भी कहलवा दें तो आपका हम पर बहुत बड़ा उपकार होगा माई बाप...
अरे भैय्ये!...जब वो आए थे तो दिखाई भी दिए होते...असली दुनिया मे थे कौनो वर्चुअल दुनिया मे कि झट से चटखा लगाया और हो गए इनविजिबल?
अब रही बात मिथिलेश जी को और आपको आमंत्रित करने की तो माई बाप...उसके लिए तो ये बड़े साईज का न्योता चिपका दिया गया था नुक्कड़ पर...आप ही नहीं देख पाए...हुज़ूर ...इसमें हमारी कौनो गलती नहीं है हुज़ूर

अब ऐसे लोगों के बारे मे क्या कहें?(जो उस वक्त तो चपर-चपर कर खा रहे थे..तारीफ़ करने से नहीं अघा रहे थे)...अब जा के उन्हें याद आ रहा है कि "गलती से हमने भी उस सम्मेलन में भाग लिया था"...
इसे कहते हैं अपने सब अच्छे किए पे पानी फेरना...
क्यों?...सही कहा ना मैंने?

कूप कृष्ण said...

बेटा निशू।मिथिलेश अपने ब्लोग पर तुम्हारी बात दोहराए तो कुछ मजा आये।

कूप कृष्ण said...

क्या खाली पीलि मक्खि मार रहे हो।इतना ही अपराधि मान रहे हो तो लपक लपक कर खाते समय शरम नहीन आई

कूप कृष्ण said...

अगर खाने पीने से जादा नहीन समझा था तो जो कुछ सम्झा था उन सब खाने के नाम लिख दो

कूप कृष्ण said...

लिखते हो कि बेनामी का खुलासा हुया।तो क्या बेनामि को इतना भाव देते हो?

कूप कृष्ण said...

अगर बेनामी को इतना भाव देते हो तो इसकमतलब हुया कि तुम बेनामी को जान्ते हो

कूप कृष्ण said...

.जिसको मैंने " खाने खिलाने " से ज्यादा कुछ भी नहीं समझा था
.
.
.
.
तो बेटा ऐसा हे कि बच्चोन को वैसे भी कुच समझ नहीन आता खाने पीने के अलावा

कूप कृष्ण said...

या फिर तुमारे दद्दू की माने तो फिर जिसकी जित्नि सम्झ होति है वह वैसी हि बात करता है

कूप कृष्ण said...

.दिल्ली ब्लोगर सम्मलेन के आयोजकों को बस यही बात ख़राब नहीं लगी बल्कि वे यहाँ तक उतारू हो गए की बेनामी से भी कमेन्ट करने से बाज नहीं आये
.
.
.
.
.
तुमारे कैने से मान ले कि जितने बेनामि कमेन्ट थे वो आयोजकोन ने किये थे

कूप कृष्ण said...

कुछ प्रमुख बिन्दुओं को लिख रहा हूँ जिससे आयोजक भी इनकार नहीं कर सकते ....
.
.
.
.

क्योन?तुमारे घर खा पी कर गये हैन क्या?

कूप कृष्ण said...

बेनामी से कमेन्ट आया की ....अजय जी ने पैसे खाए है.
.
.
.
.
मैने तो दो दिन पहले देखा था एक बेनामि का कमेन्ट कि नीशु समलैंगिक है।इस बात को लिखने मे शरम आ रही हे क्या?

कूप कृष्ण said...

रचना जी और अनूप शुक्ल जी भी आये थे ....जो मसिजीवी से ही मिल कर चले गये
'
'
'
'
रचना और अनूप इस बात का कन्फ़र्मेसन नहिन करेन्गे तो ये मान लेन कि यह सबे झूत है

कूप कृष्ण said...

रचना जी ओ अनूप शुक्ल जी आये तो यह बात सभी उपस्थित ब्लोगर से छिपाई क्यों गयी?
.
.
.
.
.
मालुम हो तो चुपायेन्गे नाऽउर ये रचना कोई भूतनि है क्या जो किसि को दिखेगि नहिन

कूप कृष्ण said...

आयोजक के बहुत ही करीबी ....उन्होंने बताया की रचना जी और अनूप जी के आगमन की बात ३ से चार ब्लोगर को ही पता थी
.
.
.
.
करीबी का नाम मत बतायो ये तो बता दो कि किसको बताया था

कूप कृष्ण said...

बेनामी से कमेन्ट आया तो इसका मतलब यह की वोह कमेन्ट करने वाले महाशय भी आयोजको में से ही हैं
.
.
.
.
मतलब यह हुया कि तुम्हारी पोस्तोन पर बेनामि से कम्न्त करने वाला तुम्हारा करीबि था

कूप कृष्ण said...

अब आयोजक कौन थे ? ये आप खुद ही पता लगाईये ?
.
.
..
क्योन तुम्हारीफट रहि है क्या नाम लेते हुये

कूप कृष्ण said...

दुसरे इंटर नेशनल सम्मलेन में हमको और मिथिलेश दुबे जी को नहीं बुलाया गया
.
.
..
क्योन तुम कोई तोप हो क्या

कूप कृष्ण said...

बुलाया तो रचना को भी नहिन गया था, जैसा तुम्हारा करीबि बेनामि बोल रहा

कूप कृष्ण said...

बुलाया तो अनूप को भी नहिम गया था,जैसा तुम्हारा करीबि बेनामि कह रहा

कूप कृष्ण said...

से ये तो आयोजक की इच्छा पर था
.
.
.
.
मतलब तुम अन्धे हो जो इतनी सारि पोस्तेन नहीन देख पाये जो चीख चीख कर सब्को सुचना दे रहि थि

कूप कृष्ण said...

बाद में रपट देख लिया था ..
.
.
.
..
रपत दिख गयी लेकिन सुचना नहिन दिखि थि।यार आन्ख है या बटन

कूप कृष्ण said...

.मिथिलेश जी ने तो कहा ...की भाई हम उस काबिल नहीं जो वह पर हमको बुलाया जाता
.
.
..
.
मतलब पिछलि बार उसके हाथ पन्व पकड कर बुलाया गया था तो न्वाबजादे गये थे

कूप कृष्ण said...

मिथिलेश भाई ने साफ कहा की चलो कम से कम गुटबाजी से बचे
.
.
.
.
जब उसका साथ दिया था रचना से भिडने मेइन तो वह भी कोई गुतबाजी थि क्या

कूप कृष्ण said...

दूसरी तरह यह भी कहता हूँ मैं की हमको तो बहिस्कृत किया गया ..
.
.
.
.
फिर वही बातऽबे किया क्या तुअम लोगोन ने जो बहिस्क्रित किये जायो।पोचना तक तो आता नहिन

कूप कृष्ण said...

इसमें किसी का दोष नहीं ...बस समय ही ऐसा बना आया की ये तो होना ही था.
.
..
.
.
.
चलिये अब यह तो माना कि किसि का दोस नहिन तुमहारे ही करम ऐसे थे कि ये तो होना हि था

कूप कृष्ण said...

कुछ बात तो अब तक छिपी है
.
.
.
..
बदिया है।मतलब अगलि पोस्त जल्दी आयेगी तुम्हारि

कूप कृष्ण said...

वैसे विचार में समानता और असमानता ही हमको दोस्त और दुश्मन बनाती हैZ
.
.
.
.
.
एकदमे सहि।बचोन बडोन के विचारोन मेइन असमानता तो रहिबे करि

कूप कृष्ण said...

तो यहाँ भी आश्चर्य क्यों ???????
.
.
.
.
.
वहि तो हम भी कहि रहे कि जबरिया कमेन्त करे के का फय्दा

Kumar Jaljala said...

बेटा नीशू जब सामान्य ज्ञान कमजोर हो जाए तो ज्ञान बढ़ाने के लिए गंदी किताबें नहीं पढ़ा करते।

Kumar Jaljala said...

ैक्या आप जानते है.
कौन सा ऐसा ब्लागर है जो इन दिनों हर ब्लाग पर जाकर बिन मांगी सलाह बांटने का काम कर रहा है।
नहीं जानते न... चलिए मैं थोड़ा क्लू देता हूं. यह ब्लागर हार्लिक्स पीकर होनस्टी तरीके से ही प्रोजक्ट बनाऊंगा बोलता है। हमें यह करना चाहिए.. हमें यह नहीं करना चाहिए.. हम समाज को आगे कैसे ले जाएं.. आप लोगों का प्रयास सार्थक है.. आपकी सोच सकारात्मक है.. क्या आपको नहीं लगता है कि आप लोग ब्लागिंग करने नहीं बल्कि प्रवचन सुनने के लिए ही इस दुनिया में आएं है. ज्यादा नहीं लिखूंगा.. नहीं तो आप लोग बोलोगे कि जलजला पानी का बुलबुला है. पिलपिला है. लाल टी शर्ट है.. काली कार है.. जलजला सामने आओ.. हम लोग शरीफ लोग है जो लोग बगैर नाम के हमसे बात करते हैं हम उनका जवाब नहीं देते. अरे जलजला तो सामने आ ही जाएगा पहले आप लोग अपने भीतर बैठे हुए जलजले से तो मुक्ति पा लो भाइयों....
बुरा मानकर पोस्ट मत लिखने लग जाना. क्या है कि आजकल हर दूसरी पोस्ट में जलजला का जिक्र जरूर रहता है. जरा सोचिए आप लोगों ने जलजला पर कितना वक्त जाया किया है.

M VERMA said...

नीशू जी
अच्छा लगा इस धमाकेदार खुलासे को देखकर. लक्ष्मी नगर में मैं भी आया था पर थोड़ी देर से. मैं तो खाने पीने से वंचित रह गया. (लगता है मुझे भी आपका साथ चाहिये शोर मचाने में). पर मैं तो उस खाने-पीने से वंचित रहकर भी जो प्राप्त करने आया था वह लेकर ही गया, वह है अपरिमित प्यार और एक नया सा बनता हुआ परिवार.
नांगलोई सम्मेलन के लिये तो कार्ड वितरित हुआ था पर वह 'सेल्फ सर्विस' वाले स्टाईल का था, आप भी ले लेते. यह कार्ड हर 'नुक्कड़' पर मौजूद था. दूर रहकर मीन-मेख निकालना आसान होता है अच्छा होता इन सब बातों का खुलासा रूबरू होकर करते.
आप तो सनसनीखेज रिपोर्टर होते जा रहे है.

अविनाश वाचस्पति said...

@ कुमार जलजला


आपका यह कहना सौ फीसदी मुफीद है कि जब सामान्य ज्ञान कमजोर हो जाए तो ज्ञान बढ़ाने के लिए गंदी किताबें नहीं पढ़ा करते।

इसमें आगे मैं जोड़ता हूं कि और न ही टिप्‍पणियां पाने, चर्चा में आने के लिए ऐसा करना चाहिए। जब हम सब एक सार्थक राह निकाल रहे हैं, जिससे सारी दुनिया सबको जाने, तो नीशू क्‍यों भाग रहे हो, हम सबसे आगे ? ऊंगली पकड़ साथ चलो। सदा भला ही चाहा है सबका और भला ही चाहेंगे। कोई रांगफहमी है तो बात करो, नहीं तो हम ही करते हैं फोन। हम छोटे भी हो जाएं तो नहीं है कोई फिक्र। न हो हमारा जिक्र कहीं, फर्क नहीं पड़ता है पर आपका बचपना देखकर दुख मुझे बहुत हो रहा है। सबसे पहले तो अपने ब्‍लॉग से बेनामी टिप्‍पणियों का विकल्‍प बंद करिए, यही मैं पहले भी कह चुका हूं और सार्थक संवाद का मार्ग चुनिए।

Anonymous said...

अजय ने पैसे खाए हैं. यूं ही कोई ढाई हज़ार रूपये अपनी अंटी से ढीले नहीं करता.
लेकिन यह अच्छी बात है की ये पैसे अच्छे काम में लगे हैं.
आखिर बेईमान लोगों में भी कुछ ईमान तो होता ही है.

Anonymous said...

अजय जैसे लोग ब्लौगिंग पर काला धब्बा हैं. इन्होने यहाँ गंद मचा रखी है.
अब ये अपना संगठन बनायेंगे और अपने विरोधियों को तबीयत से ठिकाने लगायेंगे.

अजय कुमार झा said...

प्रिय बेनामी,
वैसे तो आपकी बातों का उत्तर देने का कोई महत्व नहीं है , क्योंकि थोडी बाद ही सही जब नीशू भाई आकर पोचा लगाएंगे (नीशू भाई पोस्ट लिख कर आराम करते हैं फ़िर अगले दिन आकर पहले पिछली पोस्ट की सफ़ाई करते हैं ऐसे ही टिप्पणियां मिटा मिटा कर फ़िर एक नया विचार देकर अगले दिन के लिए विदा हो लेते हैं )तो आपकी टिप्पणी भी साफ़ हो जाएगी , मगर फ़िर भी सोचा कि आपको उत्तर देना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि एक तो आप जो भी हैं ब्लोग्गर ही हैं सो चाहे बुर्का पहन कर ही सही असली विचार तो सामने आए दूसरा ये कि आप बार बार ये देखने भी आओगे ही कि आपको उत्तर दिया गया या नहीं । तो लो

ढाई हजार हों या दस हज़ार या एक रुपया अजय ने अपने अंटी से जब भी ढीले किए हैं वो अजय की मेहनत की गाढी कमाई के हैं , न कि किसी दलाली के ओह ऐसे विश्वास नहीं होगा । एक काम करो आप तो यूं भी बेनामी हो , अजय के कार्यालय में जाकर पता करवाओ कि उसका काम कैसा है , ज्यादा नहीं कहना सिर्फ़ झा जी के बारे में भी पूछोगे तो पता चल जाएगा । और हां पहले ही कह चुका हूं कि डब्बे के सामने खट खट कर देने से काबलियत साबित नहीं हो जाते , ऐसे कामों के लिए लोहे का कलेजा चाहिए होता है मगर जिसका वजूद ही बुर्के में हो उसे क्या कहूं ।

रही बात ये कि अजय जैसे लोग ब्लोग्गिंग पर काला धब्बा हैं तो यार बेनामी में भी शर्माना कैसा < जैसे लोग < से मतलब डायरेक्ट उनका नाम ले लेना था ...और चलो मान भी लिया कि धब्बा हैं तो ....फ़िर भी तो दाग अच्छे हैं .....यार ऐड नहीं देखते क्या । संगठन बना कर विरोधियों को ठिकाने लगाएंगे ..भाई विरोधियों के नाम भी तो बता देते जब इत्ता बता ही दिया और यार विरोधी तो आप भी नहीं हो हमारे ..हमें जैसा लगता है ...बस थोडी सी समस्या है आप फ़ुंक रहे हो ..बताओ कितनी लंबी टीप करवा दी यार । पढ के न तसल्ली हो तो फ़िर गोबर कर मारना ....

रचना said...

मुझे किसी भी मीट का व्यक्तिगत न्योता नहीं मिला ना मुझे उम्मीद थी कि मिलेगा और ऐसे कार्यक्रमों मे होता भी नहीं हैं । मै अनुपस्थित थी । मैने भी अनाम का वो कमेन्ट पढ़ा था जहां ये कहा गया था कि मै मंद बुद्धिजीवी के साथ उनकी कार मे आयी थी और उसी मे बैठी रही । अफ़सोस हुआ था पढ़ कर लगा था जैसे ८ वी कक्षा का कोई बालक अपनी कक्षा के किसी लडके और लड़की को लेकर व्यंग कर रहा हैं । और ये कमेन्ट वही दे सकता हैं जो उस मीट मे था । अब इसी पोस्ट मे देख ले कोई मेरे नाम का भ्रम दे कर कमेन्ट दे रहा हैं और कूप जी तो कूप मंडूक हैं ही उनको कुछ कहना अपनी उर्जा व्यर्थ करना हैं । उनको राम प्यारी कि संगत नहीं सुधार सकी सो अफ़सोस भी नहीं होता । भैस के ऊपर मखियाँ बहुत भिन भिन्नाति हैं क्या कर सकते हैं गंदगी से अपने को दूर रखने के अलावा { मंतव्य मीट से नहीं हैं !!}

और नीशू समाज मे बहत मुद्दे हैं उन पर लिखे संगठन और गुट बाजी दोनों से ही दूर रहे । मित्रता को किसी संगठन या गुट कि जरुरत नहीं हैं

मेरा पक्ष मैने रख दिया अब अनूप और मसिजीवी कुछ कहना चाहेगे तो जरुर रखेगे

सतीश चंद्र सत्यार्थी said...

"और नीशू समाज मे बहत मुद्दे हैं उन पर लिखे संगठन और गुट बाजी दोनों से ही दूर रहे । मित्रता को किसी संगठन या गुट कि जरुरत नहीं हैं"

रचना जी की उपरोक्त बात मेरी भी मानी जाए...

अविनाश वाचस्पति said...

@ रचना


मैंने नीशू को फोन किया था पर वो वहां नहीं मिले। मैं उन्‍हें कहना चाहता हूं कि बेनामी कमेंट वाले विकल्‍प को निष्क्रिय कर दें। पिछली पोस्‍ट में भी मैंने उन्‍हें यही लिखा है। इस में भी लिखा है। पर वे न जाने क्‍यों ? ऐसा कर रहे हैं।

मसिजीवी जी से कल रात को मेरी फोन पर बात हुई है, वे आजकल परिवार में किसी विवाह को लेकर बेहद व्‍यस्‍त हैं। पर उन्‍होंने कहा है कि वे जब भी पोस्‍ट देखेंगे तो उस पर अपनी टिप्‍पणी दर्ज कर देंगे।

वे लक्ष्‍मी नगर वाले सम्‍मेलन से मेरे कहने पर कविता वाचक्‍नवी जी को साथ ले गए थे क्‍योंकि कविता जी को अक्षरम् वाले कार्यक्रम में शामिल होना था। मेरे आग्रह पर और यह विश्‍वास दिलाने पर कि मैं उन्‍हें दोपहर में स्‍वयं अक्षरम् वाले कार्यक्रम में छोड़ आऊंगा, वे साथ आई थीं और मसिजीवी जी के साथ अक्षरम् के कार्यक्रम में चली गई थीं।

जहां तक अनूप शुक्‍ल जी की बात है, वे उन दिनों दिल्‍ली में नहीं थे क्‍योंकि अगर वे दिल्‍ली में होते तो मुझसे भी अवश्‍य मिले होते और मुझसे न सही, कविता जी से तो मिलते ही। कविता जी से दिल्‍ली प्रवास के दौरान मेरा नियमित संपर्क बना रहा। हां, अनूप जी से एक बार इस दौरान बात अवश्‍य हुई थी।
यह सफाई नहीं सिर्फ असलियत है। जरूरत नहीं थी देने की, परंतु माहौल में बदमगजी न हो, इसलिए दे रहा हूं। वैसे मैं स्‍वयं नीशू से बात करने की कोशिश कर रहा हूं और दोबारा भी प्रयास करूंगा। अगर उनसे फोन पर बात नहीं हुई तो मैं मेरठ भी पहुंच सकता हूं।
सौहार्द कायम करने के लिए सदैव तत्‍पर रहना चाहिए किसी भी कीमत पर।

रचना said...

अविनाश वाचस्पति

mujeh kisi bhi baat sae koi aaptti nahin haen haa yae jarur nishchit haen ki koi haen jo aap logo ki meet ko kharaab karna chahtaa haen aur neeshu ki post bhi usii aur ingit haen wo jo bhi aap mae sae hi koi haen baat anaam kamaent ko band karnae ki nahin haen kyuki yae blog malik kaa adhikaar haen baat haen ki kaun haen jo aap logo ki saakh ko daav par lae rahaa haen anaam kament kae jariyae

apni saakh ko kyaam rakhna haen toh apnae beech sae usko khojae

rahee baat maeri mujhe koi farak nahin padtaa ab anaam kament sae kyuki badnaami uski hae jo likh raahaa maeri nahin

Mithilesh dubey said...

नीशू ने मेरे द्वारा कहे गये जो भी शब्द कहें मैं उससे समहत हूँ , मैंने उनसे कहा था कि मुझे किसी ने बुलाया ही नहीं तो मैं जाता कहाँ से , ये बात मैंने अजय भईया से भी कहा था कि मुझे किसी ने नहीं बताया इसका मुझे दुःख है । लेकिन एक बात समझ नहीं आ रही कि इस बात को लेकर इतना हो हल्ला किसलीए हो रहा है। हाँ ये बात सही है किमैं इनदिनों नेट से दुर रहा इसलिए मुझे जरा भी पता नहीं चला कि क्या कुछ होने वाला है , लेकिन मेरा मोबाईल नबंर तो था सभी के पास , लेकिन कोई बात नहीं , हाँ मुझे इस बात का दुख जरुर था कि अगर इंटरनेशनल ब्लोगिंग सम्मेलन हो रहा है तो सूचना तो पहुँचनी चाहिए थी , दूसरी बात ये कि अगर वहाँ किसी तरह के संघटन बनाने की बात की जा रही है तो क्या हम उस सघंटन या जो कुछ भी हो उसमे शामिल होने के लायक नहीं हैं , शायद हाँ इसलिए हमारी राय नहीं ली गयी । सफल सम्मेलन करवाने के लिए अविनाश भईया को बहुत-बहुत बधाई , उम्मींद है कि आपलोग आपसी सहमती से इस विवाद को सूलझा लेंगे ।

मसिजीवी said...

जैसा अविनाशजी ने ऊपर कहा ही बातें स्‍पष्‍ट हैं। मेरे अनुसार ये ट्राल कोटि की पोस्‍ट है जिसे पूरी तरह इग्‍नोर किया जाना चाहिए।

यदि इसमें रचनाजी का नाम न लिया गया होता तो ये टिप्‍पणी भी न करता। जब हम किसी स्‍त्री का नाम सार्वजनिक मंच पर लेते हैं तो दोहरे दायित्‍व के साथ बात की पुष्टि आवश्‍यक होती है।

रही बात मुझ मंदबुद्धिजीवी की, तो छोड़ो यार मुझ जैसे नामालूम व्‍यक्ति को दुनिया में इतने सारे काम और लोग हैं उन पर ध्‍यान दें। मैं उस सम्‍मेलन में लगभग विनीत जैसी स्थिति में पहुँचा था... सब लोग प्रेम से ही मिले हालांकि मेरे प‍हुँचने से हैरान दिखे न जाने क्‍यों... मूलत: मिलने गया था नीरज जाट से पर मिल नहीं पाया...उनसे मिलने की इच्‍छा अभी अधूरी है।

रचना जी से आज तक संभवत केवल एक बार ही भेंट हुई केवल कुछ सेकेंड्स की हेलो... पर ये जो आजकल हर किसी ने उन्‍हें अपने मन की गंदगी का निशाना बना रखा है इससे रचना जी के लिए सम्‍मान और बढ़ा है तथा उन्‍हें विश्‍वास दिलाते हैं कि हमारे मौन को ये न मानें कि हम उनके साथ नहीं हैं या इंडिफरेंट हैं... चुप इसलिए हैं कि केवल चुप रहकर इग्‍नोर करना ही इन बीमारों का इलाज है।

नीशू को बताना खहिए कि वे आखिर चाहते क्‍या हैं।

Anonymous said...

सिर्फ कहने के लिए बुद्धिजीवी हो सारे के सारे
खाना पीने व बदतमीजी के सिवाय किसी को कुछ
काम नहीं.

Anonymous said...

प्रश्न -: पहली मीट में मसिजीवी को अपने बीच देखकर सभी हैरान थे, बताइए क्यों?

उत्तर -: वहां किसी ने सोचा न था कि कोई अच्छा लिखने-पढने वाला आदमी भी उनकी मीट अटेंड करेगा.