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Friday, May 21, 2010

रचना जी की ही ऐसी उलाहना क्यों ?

पिछले कुछ महीनो से लेखन में रूचि जाती रही ....कारण बिलकुल साफ है की मेले में कुछ भीड़ ज्यादा ही है .....ब्लागर बंधुओं से फ़ोन से ही जानकारी मिल ही जाती है..की क्या कुछ नया  हो रहा है ...हाँ जब कभी समय मिला तो नज़र दौड़ा ली जाती है.......जो कुछ पसंद आया उसको पढ़ लिया ....एक दो पिछली मेरी लिखी पोस्ट विवाद का कारण बनी ...अच्छा बिलकुल भी नहीं लगा ...सभी ने तलवार खिची थी मेरे विरोध में ..........चलो यहाँ तक ठीक  है....पर मैंने कई बार पाया वहहै की रचना सिंह जी को बुरा भला कहा जाता  है...इस पर महिला ब्लागर ने आपत्ति तो की पर हमारे अन्य विरोधी ब्लोगर बंधुओं को जरा भी एतराज नहीं हुआ .....इस्सका क्या मतलब निकाला जाये ......हम खुद को तो अच्छा दिखाना चाहते  है. पर अपने महिला ब्लोगर मित्र के लिए कोई सम्मान क्यों नहीं है. 
हाँ मैं मुक्ति जी को  छोड़कर किसी और का नाम नहीं ले सकता हूँ ...जिन्होंने रचना से सम्बंधित बातो को हटाने की बात कही थी ...इसका मतलब की हम खुद  चाहते है. की महिलाओं पर ऐसा लिखा जाये और हम चटकारे ले कर पढ़ें ..... 

19 comments:

Anonymous said...

रचना जी को बुरा भला इसलिये कहा जाता हैं क्युकी वो औरत कि स्टरियो टाइप इमेज मे फिट नहीं होती । समझ आये आये तो रचना जी पर आई एक टिप्पणी देख लो यहाँ


मैं बेहद दुखी हुआ रचना जी का कमेन्ट पढ़कर. पाबला जी जैसी उदार हस्ती को दरकिनार करते हुए उनहोंने ब्लोगवाणी को तरजीह दी.
क्या अब हम कोई अच्छा काम बिना विरोध होते नहीं देख सकेंगे? क्या अच्छे कामों के लिए सहयोग के नाम पर अब इसी तर्क के कमेन्ट आएँगे. मैं महिलाओं का बहुत सम्मान करता हूँ, वे क्षमता से अधिक मेहनत करती हैं, सम्वेदनशील होती हैं, किसी राजनीतिक प्रपंच में नहीं पडतीं.षड्यंत्र में शामिल नहीं होतीं.
लेकिन रचना जी का कमेन्ट पढ़ने के बाद मेरी धारणा अब परिवर्तित हो रही है. ।

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

किसी भी घटना या वाकये पर रचना स्टैंड लेतीं हैं. उनका स्टैंड सही या गलत, उचित या अनुचित हो सकता है पर स्टैंड लेना मायने रखता है.

neeshoo said...

@
बेनामी जी ,,,,आपने केवल लिंक दिया ......जरा सामने भी आइये न तब बात बने ....नाम में क्या रखा है ...खुलकर बात करिए ...
@ निशांत जी ,
रचना जी हर जगह अपनी बात कहती है तो इस लिए बुरी हैं ....या फिर विरोध करती है इस लिए ... मेरे विचार आप से अलग हो सकते वहहै तो इसका मतलब ये तो नहीं की आप बुरे है या आप की उलाहना की जाये या आपको गली दी जाये ...यह किस हद तक सही है ?

honesty project democracy said...

ऐसा नहीं है की रचना जी को हर कोई बुरा कहता है / रचना जी के विचार कई मौकों पर एकदम सार्थक देखा है मैंने और अगर किसी के विचार मेरे विचार से कभी मेल नहीं भी खाता है या किसी अन्य ब्लोगर का विचार रचना जी से कभी नहीं मेल खाता है , तो भी किसी को इसका हक़ नहीं की विचार नहीं मिलने की वजह से किसी को गाली दे या अपमानित करे / ऐसे व्यवहार से हर इन्सान को बचना चाहिए और अपनी गलती को भी हर वक्त स्वीकारने की क्षमता रखना चाहिए / आज हम सब ब्लोगर को एकजुट होने की जरूरत है खासकर इंसानियत के मुद्दे पर /

faij said...

neeshoo ji , jo kisi ka samman nahi kar sakta bhala uska sammaan kaun karega ....? apni baat sab ko kahne ka haq hai ...haan rachna ji apni baat ko jarur kahti hai cahe koi kitna bhi virodh kyun na kare aur yahi sahi bhi hai ...

लवली कुमारी/Lovely kumari said...

असहमत होने पर अपशब्द कहना हिंदी ब्लोगिंग की नियति बन गई है...सबसे महत्वपूर्ण है लोग ऐसी टिप्पणियों को प्रकाशित कैसे करते हैं जो किसी को अपमानित करने को की जाती है?...जिसने लिखा वह दोषी है ..जिसने पब्लिश किया वह उससे भी बड़ा दोषी है.

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

@ नीशू

मेरा कमेन्ट इस बात पर नहीं है कि रचना जी अच्छी हैं या बुरी हैं.
मैं किसी व्यक्ति पर ऐसे लेबल नहीं लगाता.
अब आप शायद समझ गए हों.

जय हिन्दू जय भारत said...

neeshoo ji ...vicharniya mudda ....waise kisi ko galat kahne se pahle khud ko dekha jaye to behtar hoga ....har insaan me kami ho sakti hai ...wo koi bhi ho sakta hai ..baki rachna ji ko jo galat kah raha hai pahle apna daman dekhe ..

रचना said...

नीशू
मेरे बहाने एक विमर्श को खोलने के लिये थैंक्स । लोग ब्लॉगर को नहीं पढते लोग पढते हैं महिला और पुरुष को । लोग ब्लोगिंग मे भी ये सोचते हैं कि महिला कि इज्ज़त कैसे कैसे उतारो जैसे इज्ज़त कि ठेकेदारी उनकी हो गयी । मै यहाँ मुद्दों पर ब्लोगिंग करती हूँ और मुद्दों पर अपनी राय रखती हूँ जेसा कि निशांत ने कहा । मेरा कोई यासा ग्रुप नहीं हैं जो मेरे लिये इसलिये बोले क्युकी मै उसके ग्रुप कि हूँ हाँ ब्लॉगर मित्र जरुर हैं जैसे कि आप । और भी बहुत से हैं जो समय पडने पर बोलते हैं बिना मेरे कहे जैसे कि प्रवीण शाह । मुद्दों पर मेरे साथ खड़े होते हैं जैसे कि नीरज रोहिला । और मै इनमे से किसी से भी मिली नहीं हूँ यही ब्लोगिंग हैं ।

लोग कहते हैं कि मै अपशब्द इस्तमाल करती हूँ , हां करती हूँ पर तब जब कोई मेरे ऊपर या किसी भी महिला के ऊपर गलत लिखता , अप शब्द लिखता हैं । फिर वो चाहे फिरदौस हो या कोई और ।

मै विरोध करती हूँ अश्लील लेखन का , नारी के गंदे चित्रों को नेट पर डालने का इत्यादि और मेरा सब बड़ा विरोध हैं नारी को असमान समझने का ।

दीपक गर्ग said...

निशु भई,
एक बात ध्यान में रखें.फालतू में किसी गुट के खिलाफ मत बोलो.बेकार में घसीटे जाओगे.आपकी पिछली पोस्ट की हर बात से सहमत हूँ.

अविनाश वाचस्पति said...

मैं सदा से ही कहता रहा हूं कि हमें ऐसे मामलों में जहां पर मामला उच्‍श्रंखलता की हद को पार कर जाता है, वहां पर तुरंत मॉडरेशन लागू कर देना चाहिए और किसी भी ब्‍लॉग पर बेनामी टिप्‍पणी की सुविधा तो रहनी ही नहीं चाहिए। फिर भी अगर टिप्‍पणी आ ही जाती है तो उसे तुरंत हटा देना चाहिए। इस पोस्‍ट http://neeshooalld.blogspot.com/2010/05/blog-post_18.html में से मुक्ति जी का कमेंट भी हटा देना चाहिए उसमें भी कुछ उद्धरण पोस्‍टों में आए हुए हैं। हमें सार्थकता की ओर कदम बढ़ाने हैं न कि माहौल को विषाक्‍त करके आपस में वैचारिक वैमनस्‍य को बढ़ावा देना है।

रेखा श्रीवास्तव said...

यहाँ पहल मौका नहीं है जा की रचना को निशाना बनाया गया है, और भी कई मौके आये हैं और मैंने इसका विरोध किया है. ब्लॉगर सिर्फ ब्लॉगर है, आप उससे सहमत हों या असहमत अपनी राय बेझिझक दीजिये लेकिन किसी व्यक्ति विशेष के लिए आक्षेप या गालियाँ वह भी तब जब की उससे आपका कोई लेना देना न हो तो आपके ही दिवालियेपन को प्रदर्शित करता है. वैसे मैं लावली कुमारी जी से सहमत हूँ. अगर टिप्पणी में कोई गलत बात या किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप आता है तो उस टिप्पणी को रखने वाला भी उतना ही दोषी है.
अपनी सोच को परिष्कृत करके ही हम अपने ब्लॉगर धर्म का निर्वाह कर सकते हैं आगे से सभी ये सोच लें की ऐसे कमेन्ट आने पर उसे देखते ही हटा दिया जाए तो शायद इसआपत्तिजनक सोच और अभिव्यक्ति से बचा जा सकता है और ये सबके लिए उचित होगा.

Sharma ,Amit said...

आज़ादी दो प्रकार की होती है ... भौतिक और मानसिक ... हम को भौतिक आज़ादी तो मिल गई मगर मानसिक के मिलने के आसार दूर तक नहीं है ... ब्लॉग पर सब को आजदी है की कुछ भी लिखे सो लोग लिखते है , अपनी आजदी का प्रयोग सही करते हैं या नहीं ये उनका विवेक ...हमारी आदत बन गई है .. या बोले की आदत से आगे जा कर खून में समा गई है की हमको सिर्फ तारीफ़ करने वाले लोग ही पसंद आते है... जहाँ किसी ने कोई गलती दिखाई या विरोध किया झट से तलवारे म्यान से बाहर , खीच जाती है लोगो के बीच लकीरे... एक रचना जी ही नहीं और भी बहुत है यहाँ, जिनके साथ ऐसा होता है ... फर्क सिर्फ इतना है की कुछ लोग लड़ लड़ कर थक जाते है और शांत जो हाते है... राचन जी उनमें से जरा नहीं है ... और उसका परिणाम आप यदा कदा देखते ही है ... और बड़े मजे ही बात है दूसरा पक्ष जरा बुद्धि जीवियों का है और शयद ये उनको नागवार है की कोई उनकी बात काटे और ख़ास कर एक महिला ... आखिर उनके भी सम्मान का विषय है !
आज भी यह लाख टके का प्रशन है की हमे मानसिक आजादी कब मिलेगी और कब हम अपनी गलतियों को स्वीकार करना और एक दुसरे का सम्मान करना सिख्नेगे ...

फ़िरदौस ख़ान said...

हर इंसान को अपनी बात कहने का हक़ है...अगर आप किसी की बात से सहमत नहीं हैं तो सभ्य तरीक़े से अपनी बात रख सकते हैं... गरिमा के साथ... इंसान के शब्द, उसका बर्ताव उसकी परवरिश, उसकी तहज़ीब और उसके अख़लाक़ को बयां करता है...

सुनील दत्त said...

रोचक

सुनील दत्त said...

रोचक

अनूप शुक्ल said...

रचनाजी के जैसे भी विचार हैं वो उनको हमेशा दृढ़ता से रखती हैं। सही या गलत होना अलग बात है लेकिन अपनी बात कहने का वो सदा प्रयास करती हैं। स्त्री/महिला के विरोध की बात जहां भी उनको दिखती है अपनी समझ से वे उसकी खिलाफ़त करती हैं। जरूरी नहीं हमेशा वे सही ही हों लेकिन अपनी बात रखने में ये यह नहीं देखती कि कितने लोग उनके साथ हैं। बहुत लोगों को उनका यह अन्दाज नागवार गुजरता है। कुछ लोग बदतमीजी पर भी उतर आते हैं।

पिछली पोस्ट पर आये कमेंट देखकर कमेंट करने वालों के मानसिक स्तर का अंदाजा लगता है। आपको मुक्तिजी का कमेंट भी हटा देना चाहिये क्योंकि उन्होंने एक अनामी द्वारा कही बात का हवाला दिया है । अनामी ने बेहूदी बात कही वह तो हटा दी आपने लेकिन मुक्तिजी के कमेंट के बहाने वह बात वहां अभी भी है।

जितना मैं जानता हूं , ब्लॉगजगत में महिलाओं के बारे में अपने विचार मैंने लिखे थे:
ब्लॉगजगत में महिलाओं को तब तक बड़ी इज्जत और सम्मान के भाव से देखा जाता है जब तक अपनी सीमा में रहें। सीमा से बाहर निकलते ही उनके साथ लम्पटता शुरू हो जाती है। मजे की बात यह है सीमा तय करने की जिम्मेदारी भी लम्पट लोग ही निभाते हैं।

कूप कृष्ण said...

अपने महिला ब्लोगर मित्र के लिए कोई सम्मान क्यों नहीं है.





बच्चे यह बात अभी समझ मेइन नहीन आयेगी जब यही मित्र डन्डा लेकर आयेगी तब पता चलेगा कि कितना दम है तुममे
यह है परजीवी मतलब परब्लोगजीवी।इनका ब्लोग देख लो।कोई मौलीक लेखन नहीन्।बस किसी ना किसी ब्लोग या ब्लोगर को लेकर चार लाईने लिख देगी और मोदेरेशन लगा होगा या कमेन्ट ही नहीन आने देगी।ऐसा भी क्या दरपोक होना कि लिखकर किसी का कमेन्त ना आने दे।गालियान इसलिये इनको पडती है कि इसने कभी किसी को इज्जत नहीन दी सब्को एक ही तराजू मेइन रख कर अपनी पुरूश विरोधी मानसिकता से लतियाया है।सज्जन से सज्जन को भी नहीन छोडा
तुमने देखा होगा कि कभी कभी किसी सडक पर किसी कार या बाईक को देखकर कुत्ते दौडा देते हैन्। सोचा है क्योन वे हर किसी को नहीन दौदाते।क्योन्कि उस कार जैसी किसी चीज ने कभी उनक ए किसी भाई बन्धु को टकाकर मारि होगी या मार ही दिया होगा।तुमहारी यह महिला मित्र वही कार है और हमारे जैसे लोग हैन उन कुत्तोन जैसे
नहीन समझे ना?जब बच्चे से पुरूश बनोगे तो समझ आ जायेगाऽभी उस मित्र क ागाना गायो

कूप कृष्ण said...

और यह जो अनुप शुक्ल का एक्सपर्त कमेन्त है ना।इसे भी देख लोऽइसा कह रहे कि दूध के धुले हैन्।कितनी बार तो महिलायोन से माफी मानग चुके है।एक किसा तो दिखा था http://usnekhatha.blogspot.com/2010/01/blog-post_15.html पर। बाकी खुद ही अपने उस इलाहाबादी मित्र से पूछ लो और उसी उन्गली वाले ब्लोग की सब पोस्त पड लो