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Tuesday, May 4, 2010

मेरे कोरे दिल की कल्पना हो तुम

मेरे कोरे दिल की कल्पना हो तुम,

कविता में पिरे

शब्दों की व्यजंना हो तुम,

मर्म-स्पर्शी नव साहित्य की

सृजना हो तुम,

नव प्रभा की पथ प्रदर्शक

लालिमा हो तुम,

मेरे कोरे दिल की कल्पना हो तुम,

स्वप्न दर्शी सुप्त आखों में

बसी तलाश हो तुम,

सावन की कजरी में घुली

मिठास हो तुम,

चन्द्र नगरी के चन्द्र रथ पर

सवार एक सुन्दरी हो तुम,

रस भरे अधरों के अलिंगन की

कल्पित एक स्वप्न परी हो तुम,

मेरे कोरे दिल की कल्पना हो तुम ...........

3 comments:

दिलीप said...

shabdon ka umda chayan aur sundar bhavo ki abhivyakti...

निर्मला कपिला said...

बहुत दिन बाद ब्लाग पर आयी कविता पढ कर अभिभूत हूँ दिन पर दिन कविता मे खूब निखार आ रहा है। बधाई और आशीर्वाद्

अनिल कान्त : said...

Bhai Waah !