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Tuesday, October 6, 2009

हमारा समाज और सेक्स एजुकेशन

एचआईवी, यौन शोषण आदि से बच्चे कैसे बचें? जागरुकता लाने के प्रयास के तहत संयुक्त राष्ट्र के शैक्षणिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन ने यौन शिक्षा पर नए दिश-निर्देश जारी किए हैं। यौन शिक्षा पर बनाए गए अंतरराष्ट्रीय दिशा-निर्देश के तहत शिक्षक छात्रों को बताएंगे कि वे कैसे यौन शोषण, अनचाहे गर्भधारण और एचआईवी तथा यौन संचालित संक्रमण से बचें।इससे छात्रों में सेक्स संबंधी किसी तरह की भ्रांति नहीं रहेगी। हाँ जी ये कहना है भारत सरकार का जो की पश्चिम देशो के तर्ज पर भारत मे भी लागु करना चाहती है "यौन शिक्षा"। देश की अधिकांश आबादी गांवों में निवास करती है और जिसका सामाजिक-सांस्कृतिक ताना-बाना कुछ विशेष तरह का होता है। इस कारण जहां खुलेआम सेक्स का नाम भी लेना गुनाह समझा जाता है। ऐसे में भारत में यौन शिक्षा कितना कारगर साबित होगा सोचने वाली बात होगी। अब अगर ऐसे जगहों पर इस शिक्षा की बात होगी तो विवाद तो होना ही है। यौन शिक्षा के नमूने, खासकर सचित्र किताबों ने तूफान खड़ा कर रखा है। कई राज्यों की सरकारें, सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाएं और राजनीतिक व गैर राजनीतिक संगठन इस पर आपत्ति उठा रही हैं। परंतु दूसरी ओर इसके समर्थकों का मानना है कि इस विषय को प्रतिबंधित न किया जाए। हां, यौन शिक्षा संबंधी सामग्री संतुलित होनी चाहिए। न तो इसमे एकदम खुलापन हो और न ही इसे बिल्कुल खत्म कर दिया जाए। यह कहना कि बच्चों को यौन शिक्षा देने की आवश्यकता नहीं है एकदम बेहूदा तर्क है। सर्वेक्षण से पता चला है कि किशोर उम्र के लड़के कभी-कभी यौन संबंध कायम कर ही लेते हैं। भारत में प्रसूति के कुल मामलों में 15 प्रतिशत किशोर उम्र की लड़कियां शामिल होती हैं। देश में इस समय 52 लाख लोग एचआईवी से पीडि़त हैं, जिनमे 57 फीसदी मामले ग्रामीण क्षेत्रों के हैं। एड्स नियंत्रण का दायित्व संभालने वाला राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) कई राज्यों की आपत्ति के चलते स्कूलों में उपलब्ध कराई जाने वाली यौन शिक्षा सामग्री की समीक्षा करने को तैयार है। नाको का मानना है कि सेक्स की शिक्षा के लिए सचित्र किताबे वरिष्‍ठ शिक्षकों के लिए हैं। वह इनसे जानकारी हासिल कर बच्चों को समझाएंगे। उसका मानना है कि इस सामग्री से किशोरो को शरीर और शारीरिक परिवर्तनों के बारे में आधारभूत सूचना मिलती है। यदि बच्चों को यौन शिक्षा नहीं दी जाए तो वे गलत फैसला ले सकते हैं जिससे उनके भविष्य और स्वास्थ्य पर गलत असर पड़ सकता है। इसके विपरीत स्कूली बच्चों को यौन शिक्षा के विचार के विरोधियों का तर्क है कि इससे लोगों की सांस्कृतिक संवेदना को चोट पहुंचती है। इस सरकारी फैसले के पीछे विदेशी हाथ है। उनका मानना है कि इससे उल्‍टे अनैतिक सेक्स को बढ़ावा मिलेगा। विदेशी कंपनियों के सूत्र वाक्य 'कुछ भी करो, कंडोम का इस्तेमाल करो' से उनकी मंशा स्पष्ट है। सुरक्षित सेक्स का ज्ञान देकर कोमल व किशोर वय के लड़के-लड़कियों को देह-व्यापार के पेशे में उतारे जाने की आशंका जताई जा रही है। बैकाक और थाईलैड की तरह भारत को भी सेक्स टूरिज्म के बड़े बाजार के रूप में विकसित करने की विदेशी चाल के रूप में भी इसे देखा जा रहा है। एक संगठन ने तो इसके खिलाफ एक किताब 'रेड एलर्ट' छापी है। कुल मिलाकर स्कूलों में बच्चों को यौन शिक्षा की नहीं बल्कि अच्छी जीवनशैली से अवगत कराने की जरूरत है। दूसरी ओर अब सवाल उठता है कि स्कूली बच्चों के लिए, जिसका कि दिमाग एक कोरे कागज के समान होता है, यौन शिक्षा एक गंभीर विषय है। ऐसे में जल्दबाजी में उठाया गया कोई भी कदम समाज और राष्ट्र के लिए घातक साबित हो सकता है। क्या इसके बदले में किशोरो को एचआईवी एड्स, नशीले पदार्थ की लत आदि के बारे में समुचित जानकारी देकर उनको मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से निपटने के लिए तैयार करना ज्यादा उचित नहीं होगा? लेकिन अब भी हमारे यहाँ के प्रगतिवादी लोग इस शिक्षा के पक्ष में हैं न जानें क्यों। उनका कहना है कि इस शिक्षा से सेक्स अपराध रुकेगें तथा बच्चे सेक्स के प्रति जागरुक होगें। जहाँ तक मुझे लगता ऐसे लोग जो भी कहते है वह बेबुनियाद है। पश्चिमी देशों मे लगभग हर जगह यह शिक्षा मान्य है, तो वहाँ क्या होता है, यह किसी से छिपा नहीं है। अगर अकेले ब्रिटेन को ही देखा जाये तो वहाँ की हालत क्या है इस शिक्षा के बावजुद बेहद शर्मसार करने वाली जो की हमारे समाज में बहुत बडा अपराध माना जाता है। वहाँ की लडकियाँ शादि से पहले ही किशोरावस्था मे माँ बन जाती है। कम उम्र में मां बनने वाली लड़कियों के मामले में ब्रिटेन, पश्चिमी यूरोप में सबसे आगे है। संडे टेलिग्राफ में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक बड़ी संख्या में गर्भपात के बावजूद स्कूल जाने वाली लड़कियों में गर्भधारण की संख्या तेजी से बढ़ी है। स्वास्थ्य विभाग की वेबसाइट के हवाले से अखबार ने लिखा है कि हर साल 18 साल से कम उम्र की लगभग 50,000 लड़कियां गर्भवती हो जाती हैं।अगर यौन शिक्षा से ये सब होता है तो क्या इसे हमें मान्यता देनी चाहिए।
इस तरह ब्रिटिश सरकार ने पहली बार यह माना है कि यौन शिक्षा कम उम्र की लड़कियों में गर्भधारण पर लगाम लगाने में नाकाम रही है। अब बताईये ऐसी शिक्षा की क्या जरुरत है हमारे समाज को। हमारी सरकार हमेशा से पश्चिमी देशो के परिवेश को अपनाना चाहती है लेकिन क्यों। वहाँ के बच्चो को शुरु से ही यौन शिक्षा दि जाती है तो परिणाम क्या है हम सब जानते है।

4 comments:

Mithilesh dubey said...

बहुत सही कहा आपने और आपसे बिल्कुल सहमत भी हूँ। इस तरह की शिक्षा हमारे समाज के लिए आवश्यक नहीं है। और मुझे नहीं लगता कि ऐसे शिक्षा से हमारे समाज को कुछ फायदा होगा, बल्कि इससे विकृतिया और बढ़ेंगी जो की हमारे समाज के लिए ठिक ना होगा। और इस शिक्षा का परिणाम हम देख ही चुके है।

Mithilesh dubey said...

बहुत सही कहा आपने और आपसे बिल्कुल सहमत भी हूँ। इस तरह की शिक्षा हमारे समाज के लिए आवश्यक नहीं है। और मुझे नहीं लगता कि ऐसे शिक्षा से हमारे समाज को कुछ फायदा होगा, बल्कि इससे विकृतिया और बढ़ेंगी जो की हमारे समाज के लिए ठिक ना होगा। और इस शिक्षा का परिणाम हम देख ही चुके है।

हिन्दी साहित्य मंच said...

समाज का ढ़ाचा जिस तरह से निर्मित है उसके अनुसार सेक्स शिक्षा देना आवश्यक नहीं । वैसे और भी कई माध्यम से बच्चों को इसकी जानकारी दी जा सकती है ।

rohit said...

बंधु मुझे एक बात समझ मे नही आती की यह सेक्स एजुकेशन क्या बला है क्यों हर तरफ इसकी ही आवाज़ सुनाई दे रही है अरे भाइयो हम लोग भी तो बिना सेक्स एजुकेशन लिए ही बड़े हुए हैं शादी भी हुई और बच्चे भी है तो क्या यह सरकार और तमाम बुध्धिजिवि जो सेक्स एजुकेशन के समर्थन मे चीख रहे हैं हमे निरा अनेज्यूकेटेड कहेंगे क्या क्योंकि हमने तो इसे पड़ा ही नही. और फिर भाई प्रक्रति मे कोन से ऐसे जीव है जो सेक्स एजुकेशन लेते हैं. प्रकर्ती सभी को यह सीखा देती है क्योंकि यह तो प्राकर्तिक चीज़ है. भाइयो इससे तो बेहतर होगा की बच्चो को मोरल एजुकेशन दे ताकि वो समाज और देश का भला कर सके नाकी सेक्स एजुकेशन लेने के बाद उसका प्रॅक्टिकल नालेज लेने के लिए उत्साहित हो.