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Saturday, April 5, 2008

अन्तरमन

सोचता हूँ ,
क्या है अन्तरमन ?
और
क्या है बाह्यमन?
मन तो है-
केवल मन,
चंचल है,
उच्छल है,
एकाग्र है,
गंभीर है।
मेरा मन ,
तेरा मन।

7 comments:

Dinesh said...

Pyari kavita, par isase bhi bhadkar kuchh hai aapke blog men,,,
"Duniya kee sabse sundar-pyari Photo laga rakhee hai aapne......"

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुन्दर कविता हे, निस्सु जी अन्तरमन वो हे जो हमे जानता हे,ओर बाह्यमन जिसे हम दुनिया को दिखाते हे,लेकिन मन तो एक ही हे

आशीष said...

बहुत सुंदर
जारी रखें

tanha kavi said...

रचना छोटी है,परंतु अच्छी है।

बड़ा हीं निश्छल प्रश्न उठाया है।

बधाई स्वीकारें\

-विश्व दीपक ’तन्हा’

Ashok Kumar Dixit said...

अच्छा हैं, पर अधुरा हैं ना तो आपने अंतर्मन के बारे में कुछ लिखा हैं और ना हिन् वाह्य मन के बारे में लिखा हैं पर प्रयास अच्छा हैं और जयादा तो में कह नहीं सकता क्यों की मुझे पता नहीं हैं

रश्मि प्रभा said...

mann to sach me bas mann hai.....
sachha,masum,gatiman,
sundar mann.
bahya mann nahi bahri aawran hai,jo andar gunta hai,wahi mann hai........

KRAZZY said...

antarmann aur bahyamann k beech ka sambandh bahut hi saralta se shabdon k roop me is kavita me piroya gaya hai.ati uttam rachna hai yeh.