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Tuesday, September 21, 2010

मेरी माँ ....मेरा बचपन


चूल्हे ‍की आग से निकलते धुएँ से
माँ की आँखों से आँसू बहता हुआ
गाल से गले तक फिसलता चला जाता है
मैं बार बार
चिल्लाता हूँ
माँ खाना कहाँ हैं ...
माँ आँचल से मुंह पोंछते हुए
दुलार से कहती है
ला रही हूँ बेटा
खाने में कुछ पल देर होते ही
मैं रूठ जाता हूँ
माँ चुचकार कर
दुलारकर अपने हाथों से
रोटी खिलाती है
फिर भी मैं मुंह दूसरी तरफ़
किए हुए रोटी खा लेता हूँ ,
माँ प्यार से देर यूँ ही
खाना खिलाती है और मुझे मानती है
मैं माँ को देखकर खुश होता हूँ
और भाग जाता हूँ
घर में छिपने के लिए ....
माँ कुछ देर मुझे इधर उधर
खोजती है
और बक्से के पीछे से ढूंढ लेती है
मैं खुद को हारा महसूस करता हूँ
फिर माँ भी छिपती है
जिसे ढूंढकर खुश होता हूँ
..यूँ ही माँ के साथ बीता बचपन

1 comment:

गिरीश बिल्लोरे said...

“नन्हें दीपों की माला से स्वर्ण रश्मियों का विस्तार -
बिना भेद के स्वर्ण रश्मियां आया बांटन ये त्यौहार !
निश्छल निर्मल पावन मन ,में भाव जगाती दीपशिखाएं ,
बिना भेद अरु राग-द्वेष के सबके मन करती उजियार !!
हैप्पी दीवाली-सुकुमार गीतकार राकेश खण्डेलवाल