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Wednesday, May 26, 2010

सम्मेलन या गुटबाजी बनाम बेनामी का खुलासा ?? (कुछ तो हुआ ...).......................एक विचार

अभी कुछ दिन हुए इंटर नेशनल ब्लोगर सम्मलेन  को हुए ...........एक अच्छी पहल है इस तरह का आयोजन ........लेकिन इससे पहले का दिल्ली के लक्ष्मी नगर में ब्लोगर सम्मलेन हुआ था ....जिसको मैंने " खाने खिलाने " से ज्यादा कुछ भी नहीं समझा था ...ब्लोगर भाइयों  को यह बात ख़राब लगी ..पर सचे दिल से आज भी मैं उसी बात को सही पता हूँ ......दिल्ली ब्लोगर सम्मलेन के आयोजकों को बस यही बात ख़राब नहीं लगी बल्कि वे यहाँ तक उतारू हो गए की बेनामी से भी कमेन्ट करने से बाज नहीं आये ....कुछ प्रमुख बिन्दुओं को लिख रहा हूँ जिससे आयोजक भी इनकार नहीं कर सकते ....
१..............बेनामी कमेन्ट ....
मैंने कुछ दिन पहले लिखा था की " क्या मर रही है ब्लोगिंग ?एक विचार " पर  बेनामी से कमेन्ट आया की ....अजय जी ने पैसे खाए है...दूसरा यह की " सम्मलेन में रचना जी और अनूप शुक्ल जी भी आये थे ....जो मसिजीवी से ही मिल कर चले गये ? यह बात तो आजतक भी मुझे न पता चल पाई थी ...लेकिन लक्ष्मी नगर में हुए ब्लोगर सम्मलेन में रचना जी ओ अनूप शुक्ल जी आये तो यह बात सभी उपस्थित ब्लोगर से छिपाई क्यों गयी ?
दूसरा यह की  ( नाम न बताने की शर्त पर एक ब्लोगर जो की आयोजक के बहुत ही करीबी है ....उन्होंने बताया की रचना जी और अनूप जी के आगमन की बात ३ से चार ब्लोगर को ही पता थी )  अगर बेनामी से कमेन्ट आया तो इसका मतलब यह की वोह कमेन्ट करने वाले महाशय भी आयोजको में से ही हैं ...इसका मतलब की चोरी भी सीना जोरी भी ...वैसे जिसने किया वहहै वो समझ गये होगे ...अब आयोजक कौन थे ? ये आप खुद ही पता लगाईये ?
२.............सूचना ....
दुसरे इंटर नेशनल सम्मलेन में हमको और मिथिलेश दुबे जी को नहीं बुलाया गया .....वैसे ये तो आयोजक की इच्छा पर था ...मिथिलेश जी को भी कोई सुचना मिली .....हाँ बाद में रपट देख लिया था ...मिथिलेश जी ने तो कहा ...की भाई हम उस काबिल नहीं जो वह पर हमको बुलाया जाता ...बात वैसे सही भी है ...पर मिथिलेश भाई ने साफ कहा की चलो कम से कम गुटबाजी से बचे ..... दूसरी तरह यह भी कहता हूँ मैं की हमको तो बहिस्कृत किया गया ...इसमें किसी का दोष नहीं ...बस समय  ही ऐसा बना आया की ये तो होना ही था..
३...............चुपके चुपके ....
कुछ बात तो अब तक छिपी है लेकिन धीरे धीरे  ही सही पर बाहर आएगी ही .......वैसे विचार में समानता और असमानता ही हमको दोस्त और दुश्मन बनाती है ....  यानि नज़दीक और दूर करती है 
तो यहाँ भी आश्चर्य क्यों ???????

Friday, May 21, 2010

रचना जी की ही ऐसी उलाहना क्यों ?

पिछले कुछ महीनो से लेखन में रूचि जाती रही ....कारण बिलकुल साफ है की मेले में कुछ भीड़ ज्यादा ही है .....ब्लागर बंधुओं से फ़ोन से ही जानकारी मिल ही जाती है..की क्या कुछ नया  हो रहा है ...हाँ जब कभी समय मिला तो नज़र दौड़ा ली जाती है.......जो कुछ पसंद आया उसको पढ़ लिया ....एक दो पिछली मेरी लिखी पोस्ट विवाद का कारण बनी ...अच्छा बिलकुल भी नहीं लगा ...सभी ने तलवार खिची थी मेरे विरोध में ..........चलो यहाँ तक ठीक  है....पर मैंने कई बार पाया वहहै की रचना सिंह जी को बुरा भला कहा जाता  है...इस पर महिला ब्लागर ने आपत्ति तो की पर हमारे अन्य विरोधी ब्लोगर बंधुओं को जरा भी एतराज नहीं हुआ .....इस्सका क्या मतलब निकाला जाये ......हम खुद को तो अच्छा दिखाना चाहते  है. पर अपने महिला ब्लोगर मित्र के लिए कोई सम्मान क्यों नहीं है. 
हाँ मैं मुक्ति जी को  छोड़कर किसी और का नाम नहीं ले सकता हूँ ...जिन्होंने रचना से सम्बंधित बातो को हटाने की बात कही थी ...इसका मतलब की हम खुद  चाहते है. की महिलाओं पर ऐसा लिखा जाये और हम चटकारे ले कर पढ़ें ..... 

Thursday, May 20, 2010

फहरा दो पताका विश्व पटल पर..........( ये हवा कुछ बहकी बहकी है )....एक विचार

ब्लोगिंग के दौरान बहुत अच्छे लोगों से जुडाव हुआ .....एक दूसरे  की विचारधारा को जानने समझने में  आधुनिक तकनीकी ने सहयोग दिया ...केवल दिल्ली  ही नहीं वरन विदेशों में रहने वालो लोगों से नजदीकियां बनी .....आमतौर पर बाहर  बसे भारतियों छवि मेरे जेहन में खास अच्छी नहीं थी ...उसका एक कारन भी है ...हमको अपनी मातृभूमि के लिए काम करना चाहिए ...जो की किसी और देस में जा कर नहीं हो सकती ....हाँ कुछ गिने चुने लोगों की बात छोड़ दी जाये तो .......ऐसे में अंतरजाल पर मेरी मुलाकात " गुड्डो दादी " से हुई ...पहले तो प्रोफाइल देखा ...जिसमे शिकागो लिखा था यानि  यूएस  .....ईमेल से कई बार बात हुई ...बात कर मैंने पाया की मैं गलत था .....दूर देश बैठी उस महिला में देश के प्रति गज़ब का प्रेमभाव था ...धीरे -धीरे दादी से  बात कर जाना की वे भले ही हिन्दुस्तान में नहीं पर सोच पूरी तरह भारतीय है .....लोग बात करते है संस्कृति की , सभ्यता की , और नारी की .....पर इन सब मुद्दों पर दादी ने तब से लेकर आजतक के बदलाव के सकारात्मक और नकारत्मक दोनों पहलुओं पर विस्तार से बताया ....
आज हम खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करते है ......विश्वास नाम की चीज गायब हो गयी है या ये कहें की मानवता मानव में नहीं रही है .....वैसे यह विषय विचारनीय है ....(बहस हो सकती है ) ........या फिर ये कहें की नैतिक मूल्यों में गिरावट आ रही है .... इसके कई कारन साफ तौर पर देखे जा सकते है ....
* बदलाव की हवा से भारत अछूता नहीं रहा है .....तो ऐसे में बहुत कुछ परिवर्तन होना संभव है .....नंबर एक तो सोच में ....दूसरा पहनावे में ....(जिसको नारी विरोधी लोग नहीं स्वविकार  करते हैं ) ......तीसरा पहलू एकान्तवाद यानि अलगाववाद या एकल परिवारवाद ....कई और भी बिंदु है पर प्रमुखता पर इस ओर  ही मैंने ध्यान देने की कोशिश की ...
१..........शिक्षा से बौधिक छमता  में बदलाव आया यह सकारात्मक और नकारत्मक दोनों ओर हुआ .......लोगों ने दुनिया में हो रहे बदलाव में खुद को  ढालना चाहा..... जिसे हम नकारात्मक बदलाव इस लिए कहते है क्यूँ की इससमे स्वछंदतावाद दिखाई देता है ......फिर भी ऐसी बहुत सारे  लोगों ने अपनी सोच में बदलाव किया हमारी सोच से आज भी परे है पर उसको हमको स्वविकार करना होगा .
२..........पहनावे में हो रहे बदलाव पर बहुत कुछ कहा जाता है लिखा जाता है ..लोग यहाँ तक भी कहते है की पहले सोच बदले फिर पहनावा लेकिन जिसमे दोनों बदला ली उसको भारतीय संस्कृति का दुश्मन कह दिया जाता है ...अगर महिला या लड़की करे तो वह और भी बुरा है ....( सोच की बात है ) .....पहनावे पर अगर जाएँ तो भारतीय परिधान क्या है ? इस पर न तो आप ही खरे उतरे है और न महिलाएं तो महिला ही कटघरे में क्यूँ खड़ी की जाये ? 
३...........परिवार में विखराव आज की सबसे बड़ी मजबूरी और सबसे जटिल समस्या है ..जिसका प्रभाव वर्तमान में हम सभी देख रहे हैं ....खुशियाँ चहरे  पर झूठी दिखाई पड़ती है ....बच्चों  का बचपन थम सा गया ...दादा दादी को आधुनिकता का कलंक मान लिया गया ....हस्ती जिंदगी मे सब कुछ दिखावे ने ले लिया .....पैसे है पर संतोष और शान्ति गायब है .....प्यार विखर गया ....
अब इसे हम सवीकार करें या फिर प्रतिकार ? यह जटिल प्रश्न है ?
इस सामाजिक उथल पुथल के लिए कौन से कारक  जिम्मेदार आप समझते है ? स्वागत है आपके विचार का / 
 
 

Tuesday, May 18, 2010

क्या मर रही है ब्लागिंग???............एक विचार

सन २००७ में ब्लोगिंग के बारे में जाना....तब जिस रूचि और उत्सुकता के साथ ब्लॉग लिखता था वह उत्सुकता दिन_ब_दिन कम होती गयी . ऐसा नहीं की समय नहीं मिलता ..लेकिन लिखने की इच्छा ही नहीं होती .... यग्रीगेटर पर जाकर कुछ चुने लोगों को पढना आज भी अच्छा लगता है ....लेकिन लिखना न बाबा न ..... जब विश्लेषण करता हूँ पुराने दिनों का ...तो ब्लॉग से दूर जाने के कई कारण पाता हूँ .....

१_ प्रोत्साहन

ब्लोगिंग के शुरुआत में लिखने का प्रमुख कारण था की लोग मेरा लिखा पढ़े ....मेरी सोच भी लोगों तक पहुंचे ....जब की ऐसा कम ही होता ...किसी नये ब्लॉग पर ब्लॉगर जाना कम ही पसंद करते हैं ..कुछ ब्लॉगर को अगर छोड़ दिया जाये तो ...आमूमन ऐसा इसलिए भी होता है की हम नए ब्लॉग को कमतर आंकते है ...जो की नहीं होना चाहिये ...ऐसा होने पर ब्लॉगर पूरी लगन से लिखता है लेकिन परिणाम विपरीत मिलता है ..जिससे नए ब्लॉगर हतोत्साहित होते है ...फिर वह इस निराशा को दूर करने के और रस्ते तलाशता ....जो की नकारत्मकता का भी हो सकता है ....लेखन में चटकारापन , कुछ बहुत ही भड़काऊ या मसालेदार ...ऐसा मेरा मानना है ...हो सकता है आप इससे इत्तेफाक न रखते हों ..

२---- विवाद

वर्तमान में कुछ ब्लागरों ने हिट होने का नया तरीका अपनाया ....किसी पुराने लेखक से पंगा ले लो ...वह चाहे सही हो या फिर गलत... नाम तो होगा ही ....इसको हम तुच्छ लेखन कह सकते है पर यह तरीका बहुत हद तक कामयाब होते देखा ...अब यह किस प्रकार से सही है इसको कैसे बताया जाये ...

३ -----गुटबाजी

ब्लॉग लिखने पर ये नहीं सोचा था की कुछ इस तरह की राजनीती भी यहाँ होगी ....पर किसी को आसानी से नीचा दिखाना बहुत मुश्किल नहीं है बस गुटबाजी शुरू कर दीजिये ...अब ये कौन से ब्लॉगर है इसको खुद से हम विश्लेषण कर देख सकते है ..

4...सम्मेलन 

कुछ समय से ब्लॉगर सम्मेलनों ने जोर पकड़ रखा है ...कभी आपको मौका मिले तो जाकर देखियेगा.... चार दिन तक खूब फोटो आप देख पाएंगे ..इस तरह के मीट को सफल करने वाले भी कई है ...फिर हाल मेरा आज तक एक ही ब्लॉगर सम्मलेन में जाना हुआ है ..जो खाने खिलाने से जयादा और कुछ भी नहीं लगा ...


५.....सकारात्मक सोच में बदलाव

हम इन्सान होने के नाते हमेशा सकारात्मक नहीं सोच पाते ...किसी दूसरे से अपनी तुलना करने लगते है जो किसी तरह से सही नहीं है ...किसी से प्रेरणा लेना गलत नहीं पर उस जैसा बनने के लिए कुछ भी कर जाना गलत है ...


अंततः
कहना सिर्फ इतना चाहता हूँ की हम अपने लिए लिखे ....अपनी भावना व्यक्त करें ...किसी प्रकार से मतभेद के बीज न बोयें ....ताकि भाईचारा कायम रहे ...कोई किसी से असभ्य भाषा में बात न करे ... हो सकता है मेरे विचार से आप सहमत न हों पर मैंने जो देखा इन कुछ सालों में वही लिखने की कोशिश की है ....

Wednesday, July 29, 2009

मनोरंजन या संस्कृति पे आघात

"भारत की महान संस्कृति पर क्या "हमला नही हो रहा है ?" क्या आपको नहीं लगता की हमारे घरो मे नित्यदिन चलने वाले मनोरंजक सीरियल जिन्हे हम अपने परिवार के साथ देखते है, हमारी संस्कृति की ख़राब पेशकश इन सीरियलो द्वारा हो रही है ?आपके बच्चो पर इनका क्या असर होगा ?। देखने मे ये सीरियल पारिवारिक लगते है और बङे चाव से हम अपने परिवार के साथ बैठ कर देखते है। और अचानक कोई ऐसा द्रिश्य जो की आपत्तीजनक अवस्था मे होता है, तब हम उस चैनल को हटा देते है क्यो?


हमे लगता है की सायद हम ऐसा करेगें तो बच्चे उस अश्लिल द्रिश्य को न देख पाये। पर जब हम ऐसा करते होगे तब बच्चो के मन कुछ सवाल तो उठते ही होगें।आज कल टिवी पर आने वाले सीरियल अपने टी.आर.पि रेटिंग को बढाने के लिये जो हथकन्डे अपना रही है, उससे न सिर्फ हमारे संस्कृति पे आघात बल्की हमारे संस्कृति पे एक बदनूमा दाग छोङ रही है, जो भारत जैसे देश जहां की पहचान ही उसकी संस्कृति से होती है के लिये एक चिन्ता का विषय है। आज कल टिवी पे आने वाले सीरियल मनोरंजन के नाम मारपिट और गाली गलौच परोस रहे है, जिससे हमारे बच्चो की मानसिकता मे बहुत ही ज्यादा परिवर्तन हो गया है। सीरियलो मे आज कल ये दिखाया जाता है कि, कैसे आप अपने भाई के संपत्ती को हङपेगे, कैसे बहू अपने सास से बदला लेगी, कैसे आशीक अपने प्रमिका को पटाता है, और कैसे बेटा अपने माँ बाप को घर से बाहर कर देता है। इस प्रकार के सीरियलो को देखने के बाद हमारी मानसिकता कैसी होगी ये तो आप समझ ही सकते है। जहां तक हम और आप जानते है, ये तो हमारी संस्कृति हो ही नही सकती। हमे तो ये पता है कि हमारे यहां भाई लक्षमण जैसा और बेटा भगवान राम जैसे होता है। जहां तक हम जानते है हमारे यहा की औरते बलिदानी ममता से परिपुर्ण और अपने पति के साथ हर हालात मे रहने की कसम खाती है, लेकीन जो हमारे सीरियलो मे दिखया जा रहा है की अगर पति ने अपने पत्नी को थप्पङ मारा है तो ये बात तलाक तक पहुचती है,मै ये नही कह रहा हूं कि पति को अपनी पत्नी को थप्पङ मारना चाहिये, यहा मेरे कहने का मतलब बलिदान और शहनसीलता से है। । इस तरह के सीरियल से हमारे संस्कृति पे जो घाव किया जा रहा है वह दंडनीय है।

और सबसे बङी चिन्ता की बात ये है की इस प्रकार के सीरियलो को ज्यादा पसंन्द किया जा रहा है अगर हमे अपनी संस्कृति जिसके लिए हम जाने जाते है, को बचाना है तो हमे इस प्रकार के सीरियलो को नकारना होगा ताकी ये और अपने पैर ना पसार सके।।

प्रस्तुति- मिथिलेश दुबे की

Wednesday, March 4, 2009

गांधी जी बिक रहे हैं....................चलो ले आते हैं


कभी कोई आधा खाया केला नीलाम होता है, तो कभी कोई चुइंगम। ऐसे आश्चर्य देखने और सुनने को मिलते रहते हैं। कहीं से खबर आयी की गांधीजी नीलाम हो रहें। पर यह कैसे हो सकता है? वो हैं ही नहीं तो उनकी नीलामी कैसे? फिर दिमाग पर जोर डाला तो सोचा शायद विचारों की बोली लग रही हो? जो चाहे इस बोली में अपने मन पसंद से बोली लगाकर गांधीवादी बोली खरीद सकता है। खबर अच्छी थी और अच्छी लगी, कमसे कम अब उन तुच्छ लोगों काभला कुछ समय के लिए जरूर हो जायेगा । जो अच्छे बनने का दिखावा करते हैं। ऐसे विचारों का मोल अनमोल हो जायेगा। पर अब जबकि विचार ही नहीं पनपते तो विचारधारा का क्या ?पहचान के मायने नोटों का वो बंडल है जिसके पीछे सभी भागते हैं , आजीवन।


बोली का दिन समय और स्थान तय हुआ । एक से बढ़कर एक हैवान,शैतान,और इंसानकी जमात शामिल है इस बाजार में । एक दूसरे पर चढ़बैठ रहें कि कहीं कोई बात छूट न जाये लेनें में। कोई विचारनिकल न जाये सामने से।धीरे-धीरे, मानवता,इंसानियत, प्रेम,भाईचारा,मददसभी कुछबिकता है जोरोंशोरों से ,जो जितना आगे है लपक कर ले रहा है । जो बोली ज्यादा लगा रहें है उनके चेहरे खिले हुए है, प्रसन्ता का असर में धक्कामुक्की में दिख रहा है ।उत्पात की झड़ी लगी है ।रेलमपेल मचा है। । अब बारी आती है उन कुछ टूटे फूटेसमानों की( जिसका आकलन करना किसी व्यक्ति के लिए आसान नहीं) तो सब अपना-अपना रास्ता तय करते हैं। कोई उत्साह नहीं । इन फटे पुराने से अच्छा तो नामचीनी औरब्रांड के कपडे और सामान सस्ते में मिल जायेंगें । इनका क्या करेंगें भला?जैसे तैसे बाजार बंद होती है आम इंसान सिवाय देखने और सुनने के अलावा कुछ भी न पाता है ।

वह तो सब बातें सुनता है और अपने में ढालता है। और खुशी-खुशी लौटता है । कुछ न मिला तो क्या ? गांधीजी तो मिल गये ना।वो भी बिना कुछ दिये हुए,पर देने को क्या था ही ? सिवाय दुख के।