Monday, March 31, 2008

वास्तविकता और ग्लैमर पत्कारिता की।

मीडिया को चौथा स्तम्भ कहा गया है लोक तंत्त का । और ये बहुत हद तक सही भी है । अगर पत्कारिता न होती तो ये लोकशाही का चोला पहने हुए नेता आजाद रहते । किसी का डर नहीं होता पर मीडिया ने इन लोगों पर जरूर लगाम लगाया है। । और बीते कुछ वर्षओं में जो स्टिंग आपरेशन हुए उससे ये नेता और भी सजग हो गये।
पत्कारिता में कैरियर बहुत ही उज्ज्वल है पर आपमें दम होना जरूरी है आपकी जड़ मजबूत होनी।चाहिए। मीडिया संस्थान की भरमार है ,अब आप को ये देखना है कि आप के लिए सबसे अच्छी शिक्षा कौन दे सकता है। ये आपको स्वयं चुनना होगा। वैसे भी चलये आपने पढ़ाई पूरी कर ली तोअब आप को आवश्यकता होती है किसी भी चैनल या फिर एन जी ओ या फिर न्यूज पेपर में जाब मिले जिससे रोजी रोटी आगे बढ़े।
बड़ी भाग-दौड़ करने के बाद जाब कहीं न कहीं तो मिल ही जाती है, कयोंकि भारत में पता नहीं कतने अखबार निकलते है , चैनल सुरू होते हैं और कब बंद हो जाते हैं ै तो इसमें आसानी से स्थान बनाया जा सकता है।चलिये जनाब नौकरीमिल गयी।।
अब प्रमुख बात कि हमने पत्रकारिता को क्यों चुना ? आखिर हम इस फील्ड में क्यों आये ? कुछ उद्देश्य होगें कुछ मन में सपना रहा होगा?इसलिए आये ।
समाज के विकार को दूर करने के लिए प्रयास कर सकें इस लिए आये।पर सच्चाई तो कुछ और ही हो जाती है । क्योंकि किसी किताब में मैने पढ़ा था कि आजादी के पहले की पत्रकारिता एक जज्बा थी ,आग थी। और एक उद्देश्य को लेकर चली थी । वैसे आज भी पत्रकारिता का उद्देश्य पर वह है खुद को लाभ पहुचाना। एक रोजगार बन गया है यह । कलम की ताकतपैसे के सामने झुकती है, कलम की धार में वो पैना पन नहीं रहा जो कि होना चाहिए ।।
मैं भी पत्रकारिता का छात्र हूँ और इस लिए अभी तक मेरे सोच के अनुसार- मैं पत्रकारिता को एक रोजगार के रूप में देखूँ तो ही अच्छा रहेगा।।
्।
समाचार ,अखबार वो माध्यम है जो कि लोकतंत्र की शक्ती हैं और इनका ये व्यवसायीपन कहां तक सही है ?आखिर आम जनता का क्या होगा ? कई अखबार ऐसे हैं ( नाम लेना उचित नही है) जिनमें खबरें कम और एडव्रटीजमेंट ज्यादा होता है । । एक पालिशी के तहत सारा काम होता है । अगर आप स्वातनत्रत लेखन को सोचके आये हैं इस फील्ड में, तो बदालिए खुद कोनहीं तो आगे बहुत मुशकिलें आने वाली हैं।।
एक पत्रकार के सारे सपनोंं को टूटता देखता ह मैं । संपादक की कुर्सी पे बैठा है व्यवसायी । खबरों की सच्चाई को कत्लेआम कर देता । ँदुख भी होता और घुटन भी पर क्या कर सकते हैं ? इसी तरह से जीना है । यही है वास्तविकता पत्रकार की......

गरीबी ही का तो दुख है


मेरा लड़का डाक्टर बनेगा , मेरालड़का इंजीनियर बनेगा ऐसा सपना हर मां बाप अपने बच्चओं के लिए देखा करते हैं । आखिर कौन नहीं चाहता कि उसके बच्चे खुशहाल रहें। बात शिक्षा की है । सपने देखना अच्छा होता है पर सपनों को सच करना तो थोड़़ा मुश्किल काम होता है हां अगर सही दिशा में प्रयास करें तो कुछ भी सम्भव है । "कौन कहता है कि आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तबियत से तो उछालों यारों " ये एक ऐसा शेर है जो जगाता है आशावादी सोच को कुछ कर गुजरने के माद्दे को।
आज की शिक्षा का स्तर बहुत अच्छा होते हुए भी अच्छा नहीं है .स्कूल के अलावा भी ट्यूशन का फैशन चल निकला है जैशे इसके बगैर शि्षा अधूरी सी हो गयी है।आम आदमी की बात की जाय तो आज के समय में आम आदमी के लिए बच्चओं को अच्छी पढ़ाई करना बहुत ही मुशकिल हो गया है। क्यों कि महगाई की रफतार से आय की रफतार कहीं ज्यादा ही धीमी है। तो ऐसे में अच्छी पढ़ाई के लिए अच्छा पैसा भी होना आवश्यक हो गया है , अगर किसी मध्यम वर्ग के परिवार में दो बच्चे हैं तो बहुत हीहठिनाई के साथ उनको पढ़या जा सकता है । वो भी इण्टर तक{12 वीं क्लास } । इसके बाद की बात की जाय तो लोग आज केवल प्रोफेशन कोर्स को पढ़ना ज्यादा अच्छा मानते है ,और बात भी सही है क्यों कि पढ़ाई कर के लड़का तुरंत हीकमायी करे यही चाहते हैंसभी । पर प्रोफेशनकोर्स कि फीस की बात ही क्या है दिन दूना रात चौगुना बढोत्तरी हो रही है तो आप बताइये कि इतना पैसा आयेगाा कहां से । अगर कहीं से आभी जाता है तो उसकी भर पाई कैसे होगी । दो जून की रोटी जिसको बमुश्किलन नसीब हो रही है वह भला ऐसा रिश्क कैसे ले सकता है।
हां सरकार के द्वारा एजुकेशलन लोन की व्यवस्था जरूर है पर ये लोन उसी को आसानी से मिलता है जिसके पास पहले से कुछ है या फिर मोटी रकम को दिया बैंक के अफसर को। तो इतना झंझट कौन करे हां ।हांपर जिन्होंने किया है वे अपने आप में मिसाल जरूर हैं । रोजगार के अवसर बहुत है पर पैसे वालों के लिए ही।
पढ़ाई का स्तर सुधरा है पर गरीब के लिए नहीं । मतलब जो अमीर हैं वो तो अमीर बनेगे ही न। भला गांव का मजदूर क्या सोचेगा ये सब बस .जिने कमाने में ही पूरा जीवन कट जाय बहुत है ।
कुछ कार्यक्रम बनाने से नही बदल सकता है गरीब घर । और इनको ही बदलना है अब कैसे ?
कोई चमत्कार तो होगा नहीं. करना तो हमको ही होगा न तो हम जो कर सकते है वो करें यह हमारे ऊपर है कि हम क्या कर सकते हैं।।।
सपने के भारत में आखिर इन लोगों का भी तो सपना जुड़ हुआ है न।तो इनके बारे में भी सोचना ही होगा??

Saturday, March 29, 2008

रिश्ते में क्यों आगयी कडुवाहट ?

जीवन की इस भाग दौड़ में रिशते कुछ धूमिल हो गये हैं, आपस में एक दूसरे पर अविश्वास की गहराई में दिन-प्रतिदिन जो फासला है वो बढ़ता ही जा रहा है।।कुछ रिश्ते टूटते हैं तो कुछ नये रिश्ते भी बनते हैं यह सिलसिला जीवन भर ऐसे ही चलता रहता।नये रिश्ते को बनाना मुश्किल नहीं पर पुराने रिश्ते को कायम रखना मुश्किल है ,जो न जाने कब से है हमारे साथ ,शायद जब हम बोलना नहीं जानते थे या फिर हम चलना नहीं जानते थै।
जिन हाथों का सहारा पकड़ के चलना सीखा . जिनके आवाज से तुतलाकर बोलना सीखा । आज उन रिश्तों को हम कहीं दूर छोड़ आये है ,आखिर में मानवता का गला हमने घो़ट दिया ,हम जब भी कुत्ते को पालते तो आमतौर पर यही सोच के कि हमारे दरवाजे पर किसी के आने पर भौकेगा जरूर.
,अपने मालिक के प्रति वफादारी निभायेगा। जब हम जानवर से ये उम्मीद लगा सकते हैं या लगाते हैं, तो हम तो मानव हैं इस सृष्टि की सबसे सुन्दर रचना,जो समझता हैदूसरे के प्रेम को उसकी भावनाओं । आज हम अपने जिगदीं को सवारने वाली कड़ी के अस्तित्व को इन्कार कर रहें , आखिर कल जब यही मेरे साथ होगा तब. वर्तमान में है हम। कितना गलत है ये हमको भी पता हम भी जानते ,पर बहाना बना कर लिया अनजान होने का , चादर ओढ़ ली है दिखावे और भूलते जा रहें नाते रिशते।
जब अपने से ज्यादा करीबी कोई पराया लगता है तो क्यों टूट जाता है इंसान इतना , वैसे समय का नजरिया यही है और माग भी यही है। इस भीड़ में भी मिल जाते है अन्जान े चेहरे कुछ पल को पर हाथ नहीं बढ़ता जिदगी भर साथ निभाने को ।
किसी को समय नहीं है , किसी के पास पैसे नहीं और किसी के पास सबकुछ है तो भी वह भूलता जा रहा है अपने अपने उस जड़ को ,उस नीव को जिस पर की आज ये आली शान इमारत बनी है । ऐसेनहीं तैयार होता है गुलशन में फूल , आखिर माली ने तो बहाये ही होगे पसीने अपने सीचा होगा अपने खून से । पर अहिमियत को भूल कर हमने दिखाया ये कि हम को नहीं खुद को भूल गये है , खुद को भूल गये हैं।
आइयेसोचे और मनन करे इस पर ।।।

द्रविड़ दसहजारी

राहुल द्रविड़ ने अपने टेस्ट करियर के दस हज़ार रन पूरे किए.इसके लिए द्रविड कि बधाई
चेन्नई टेस्ट के चौथे दिन दक्षिण अफ़्रीका की टीम ने दूसरी पारी में एक विकेट के नुक़सान पर 131 रन जोड़कर भारत से 44 रन की बढ़त ले ली है. रविवार को मैच का आख़िरी दिन है.उसके पास नौ विकेट बचे हुए हैं और आख़िरी दिन ही भारत को भी दूसरी पारी खेलने का मौक़ा मिल सकता है. ऐसे में मैच के ड्रॉ होने की संभावना बढ़ गई है.पिच पर नील मैकेंज़ी और हाशिम अमला बने हुए हैं. मैकेंज़ी ने 59 रन जबकि अमला ने 35 रन बनाए हैं.इससे पहले कप्तान ग्रैम स्मिथ को दूसरी पारी की शुरुआत में ही 35 रन के स्कोर पर हरभजन ने एलबीडब्लयू आउट कर दिया था.
भारत ने पहली पारी में 627 रन बनाए हैं वहीं दक्षिण अफ़्रीका की टीम ने पहली पारी में 540 का स्कोर खड़ा किया था.
तीसरे दिन के खेल तक भारतीय टीम ने मात्र एक विकेट के नुक़सान पर 468 रन बना लिए थे लेकिन चौथे दिन 319 रन बनाकर सहवाग जैसे ही पेवेलियन लौटे, भारतीय पारी लड़खड़ा गई.दक्षिण अफ़्रीका के गेंदबाज़ों ने चौथे दिन मात्र 159 रन देकर ही भारत के नौ विकेट झटक लिए.
मैच में सहवाग के बाद अगर किसी ने कुछ ख़ास योगदान दिया तो वे राहुल द्रविड़ और वीवीएस लक्ष्मण रहे.द्रविड़ ने 111 रन बनाए और इसके साथ ही अपना नाम टेस्ट क्रिकेट में दस हज़ार बनाने वालों की सूची में शामिल करा लिया. दस हज़ार रन पूरे करने वाले वे दुनिया के छठें खिलाड़ी बन गए हैं.
सहवाग के आउट होने पर सचिन तेंदुलकर आए लेकिन वे बिना कोई रन बनाए ही पेवेलियन लौट गए.
धीरे-धीरे शतक की ओर बढ़ रहे द्रविड़ का साथ देने के लिए सौरभ गांगुली मैदान में उतरे लेकिन वे 24 रन बनाकर आउट हो गए. इसके बाद द्रविड़ को 111 रन के निजी स्कोर पर कैलिस ने लपक लिया.
इसके बाद धोनी भी 16 रन बनाकर पेवेलियन लौट गए. धोनी के बाद अनिल कुंबले, हरभजन सिंह और आरपी सिंह भी कुछ-कुछ देर के अंतराल पर लौट गए.
अंतिम विकेट के लिए पहुँचे श्रीसंत ने चार रन बनाए ही थे कि 39 के निजी स्कोर पर खेल रहे लक्ष्मण को हैरिस ने आउट कर दिया. पूरी भारतीय टीम 627 रन बनाकर आउट हो गई.

Friday, March 28, 2008

मेरे जीने का सहारा

प्रिये ,
क्यों अब आती हो इतनी देर से,
जबकि तुमको ये पता है कि -
मै कर नही पाता इंतजार,
कुछ ही पल में हो जाता हूँ बेकरार,
क्या तुम्हें कोई नया खेल सूझा है ,
मैंने तो तुम को ही पूजा है,
फिर आखिर क्यों आती हो इतनी देर से।।
जानती हो प्रिये -
अब तो करता हूँ मैं इंतजार हमेशा रात का और ,
उसमें तेरे साथ का ,
जब मिलते हैं हम दोनों कुछ पल के लिए ,
इन पलों में मैं जीता हूँ पूरी जिदगी,
पर
अब तुमने भी कम कर दिया आना ,
और
आती भी हो तो देर से,
क्या तुम भूल गयी हो मेरा प्यार ,
हम रह नही पाते थे एक दूसर के बिना,
सो नहीं पाते थे सारी - सारी रात ,
वो याद है पूनम की रात जब हम मिले थे बगीचे में ,
और पूरी रात गुजार दी थी हमने एक-दूसरे को ताकते हुए,
और फिर तुम अचानक सी जगी थी ,
आयी थी होश में जैसे,
हड़बड़ाहट में छोड़ गयी थी पाजेब निशानी अपनी,
शायद तुम तो भूल ही गयी हो ,
पर
मैं कैसे भूलूँ ,
यही तो हैं मेरे जीने का सहारा ,
मेरे जीने की ख्वाहिशें ,
हकीकत में नसही पर ख्यालों ,
ख्वाबोंें में तुम मेरी हो ,
कोई नही कर सकता जुदा हमको,
तुम भी नहीं।।

संस्कार या फिर परवारिश में आ रही है गिरावट

भारतीय समाज की अपनी अलग विशेषताहै ,जिसके कारण यह अपनने आप में विश्व के हर समाज से भिन्न है। मैंने कुछ दिनों पहले पहले धर्म और आस्था के विषय को चुना था । परआज समाज के महत्व को सामने रखने की इच्छा है। बात युवा पीढ़ी से करें तो हम आज विश्व के सबसे युवा देशमें गिने जाते हैं। और हमारे समाज के बागडोर अनुभव और समझदार बुजुर्गों के हाथ में होती है जो कि सही सलाह और सही मार्गदर्शन कराते हैं किसी भी पहलू पर ।।
जब हमारे यहां कोई बच्चा होता है तो ऊत्सव का माहौल होता है खुशियां मनायी जाती है । बच्चे को बचपन से लेकर युवा अवस्था तक पहुँचते हुऐ अनेक आचरण सिखाये जाते है। जैसे - बड़ों को सम्मान देना, माता पिता एवं अपने बुजुर्गों का आदर करना। बात संस्कार की आज मेरे मन में है जिसके लिए मैंने ये ताना बाना बुना है। हमने जिस संस्कार का विवरण ऊपर दिया है वो आज दिखते है पर ये संस्कार कुछ नकुछ धूमिल होते जा रहेंहै।। मैं ये नही कहता कि आज हमारेसंस्कार खत्म हो रहे है। पर कुछ न कुछ कमी जरूर हो रही, चाहे हो पालन-पोषण में हो या फिर परिवार के लोगों का बच्चों की परवरिश में आभाव हो।
हमारे नैतिक स्तर के स्तर में गिरावट हुई हैयह बात हम सब को माननी ही होगी।
हम अपने को बहुत पढ़ा ंलिखा होने पर बड़ों को सम्मान देना भूल जाते हैं ऐसा होते मैंने देखा है । आज के युवा का चलन आपने से बड़ों से मिलने का जो है वो है हाय, हैलोतक सीमित रह गया है।
कुछ दशक की बात करें तो हम अपने बुजुर्गों को झुककर पैर छूते थे ,यहां पर पैर छूने से जो मतलब था वो मात्र था सम्मान देने का ।
पर आज इस तरह के दृश्य हमको देखने को मिलता है कि जब बेटा बाप से मिलता है तो हाथ मिलाता है आखिर कहां गया वह भारत जहां कि हम अपने से बड़ो के लिए अपना स्थान छोड़ देते थे। । यह बदलाव विकास का है या फिर पाश्चात्य सभ्यता का है, जिसके की हम गुलाम होते जा रहें है। अच्छी बाते ं हमें हर समाज से लेनी चाहिए वो चाहे जितना बुरा कयों न हो पर बुरे समाज की बुराईयों को हम बहुत अच्छे से ले रहें है।
मुझे दुख हुआ तब जब मै आजअपने दोस्त के घर गया (जहां पर मुझे ये बताया गया था जकि हमेशा बडोंको आप सम्मान दो) वहीं मुझे उनसे हाथ मिलाना पड़ा । बहुत ही अटपटेतौर पर मैंने हाथ मिलाया और मन में यह बात बार-बार सोचता रहा कि क्याहमारे आजेहमसे दूर जा रहें है । कयों इतना बदलाव आगयाहममें । ।बाबा की बाते आज भी याद आती हैं हम को, कि भैया( साहब प्यारसे पुकारते थे) तू रोज सबेरे उठके अपने से जेतना जने बड़ा अहइ उनकै गोड़ धरा करा ( अवधी भाषा के शब्द थे ) ।
न जाने ये बात जादू जैसी लगती है।।

मुल्तान का सुल्तान आज चेन्नई में आग उगालता हुआ।।।


क्षिण अफ़्रीका के ख़िलाफ़ चेन्नई टेस्ट में वीरेंदर सहवाग के धमाकेदार दोहरे शतक की बदौलत भारत ने अपनी स्थिति मज़बूत कर ली है .दक्षिण अफ़्रीका ने अपनी पहली पारी में 540 रन बनाए हैं.
वीरेंदर सहवाग के धमाकेदार बल्लेबाज़ी से दक्षिण अफ़्रीकी गेंदबाज़ों के छक्के छुड़ा दिए. उनकी आक्रमक शैली का आलम ये था कि उन्होंने किसी भी गेंदबाज़ को नहीं बक्शा चौकों की तो उन्होंने बरसात कर दी. उन्होंने दोहरा शतक केवल 195 गेंदों पर 32 चौके और 2 छक्के लगा कर पूरे किए.वसीम जाफ़र ने भी अच्छी पारी खेली
तीसरे दिन के खेल में सहवाग ने अपना वही खेल दिखाया, जिसके लिए वे जाने जाते हैं. सहवाग के टेस्ट करियर का ये तीसरा दोहरा शतक है.सहवाग अपने टेस्ट करियर में तिहरा शतक भी लगा चुके हैं. ऐसा करने वाले वे भारत के पहले खिलाड़ी बने थे. सलामी बल्लेबाज़ के रूप में वसीम जाफ़र ने सहवाग का अच्छा साथ निभाया.जाफ़र ने 73 रन बनाए और पॉल हैरिस की गेंद पर कैलिस के हाथों कैच आउट हुए. .
लेकिन वे शतक लगाने से चूक गए और लंच के बाद 73 रन बनाकर आउट हुए. उनके आउट होने के बाद राहुल द्रविड़ पिच पर पहुँचे. लेकिन एक बार फिर वे काफ़ी धीमी पारी खेल रहे हैं.
दक्षिण अफ़्रीका की ओर से हाशिम अमला ने सर्वाधिक 159 रन बनाये।
सहवाग ने अभी तक २८१ रन बना लिया है । और जिसमें ४१ चौके और४ छक्के शामिल हैॅ आश्चर्य नहीं होगा जो सहवाग यहां पर आपना तीसरा शतक ब्नाते हैं ।।

Thursday, March 27, 2008

गजलः बने तो मौत बने

जब लगा खत्म हुई अब तलाश मंजिल की,
धोखा था नजरों का वो इसके सिवा कुछ भी नहीं।

समझा था कैद है तकदीर मेरी मुट्ठी में,
रेत के दाने थे वे इसके सिवा कुछ भी नहीं।

मैं समझता रहा एहसास जिसे महका सा,
एक झोका था हवा का वो इसके सिवा कुछ भी नहीं।

मैं समझता रहा हूँ जिसे जान, जिगर , दिल अपना,
मुझे दीवाना वो कहते हैं और इसके सिवा कुछभी नहीं।

आजकल प्यार मेैं अपने से बहुत करता हूँ,
हो ये ख्वाब इसके सिवा कुछ भी नहीं।

लगा था रोशनी है दर ये मेरा रोशन है,
थी आग दिल में लगी इसके सिवा कुछ भी नहीं।

तेरे सिवाय जो कोई बने महबूब मेरी,
बने तो मौत बने इसके सिवा कुछ भी नहीं।

क्या सामाजिक सोच में ही है बुराई?

समाजसेवा की बात आते ही ही हम अपने पैर पीछे खींच लेते है। अनेक बुराई होने पर भी हम विश्व में अभी भी सबसे अच्छे है। बात बाल विवाह की करें या फिर दहेज प्रथा की ।इन बुराइयों को हम हमेशा ही देखते है और देख कर आंख मूद लेते हैं।अपने आप में इतना स्वारथी होना कभी -कभी खुद के लिए बहुत ही घुटन भरा होता है। समाज को पढ़ा-लिखा करने की बात होती है हमेशा ही ,पर मेरा ये मानना अभी भी है कि जो जितना पढ़ा-लिखा होता या जितनी ऊँची पोस्ट पर होता है ,उसको उतना ही दहेज मिलता है वह आराम से लेता भी है ।
मैं मानता हूँ कि अगर मेरे बहन होति और जब हम उसकी शादी कहीं करते तो हमें दहेज जरूर देना होता कयों कि दहेज आज के समाज में मानव मुल्यों और उनके स्तर को नापने का तरीका है। यहां पर क्या पढ़ाई का कोई योगदान है इस बुराई को हटाने में। नहीं बिल्कुल भी नही। हमसे कुछ साल पहले मां ने पूछआथा कि तुम क्या दहेज लोगे तो मैने कहा था कि हां लूँगा कयोनंकि शादी एक ही बार होती है और इस मौके को कैसे जाने दूँगा। मेरी सोच अपरिपक्कव थी । पर जब दुनिया में कदम रखा तो यहसंकल्प किया कि कम से कम में इस बुराई को तो स्वयं में नही आने दूगा। समाज को नहीं बदल सकता पर खुद को बदलूँगा।। वैसे भी एक -एक के परिवर्तन से ही समाज बदलता है।
हां तो बात यह थी जो अपनी बहन के लिए दहेज देता है वह अगर चाहे तो दहेज न ले और इसके लिए उसे कोई भी मजबूर नही कर सकता है हां ये जरूर हो सकता है कि परिवार के कुछ लोगो के आशाओं पर प्रभाव पड़े जिन्होंने कुछ सपने पाल रखे होगे दहेज से।।
वैसे भी कुछ अच्छा करने के लिए हमेशा ही विरोध हुआ है और होता ही रहेगा । स्वयं से यह बात लानी होगी किसी के कहने से नही । खुद प्रयास करना होगा।।

Wednesday, March 26, 2008

ख्वाब में ...........प्यार में .......

ख्वाब में ...........

इस ख्वाब की दुनिया से निकालो हमको,
हक तुम जो समझती हो तो अपना बना लो हमको।
वैसे भी बदनाम है हम इस जमाने में,
चाहो तो डूबो दो या तो बचा लो हमको।।



प्यार में .......
सारी-सारी रात जागता हूँ तुम्हारे प्यार में,
जिंदगी का हरपल काटता हूँ इंतजार मे।
आखिर बात तो होती है अब हर रोज ही,
फिर क्यों डरता हूँ तुमसे इजहार में।।

धर्म और आस्था

धर्म और संस्कृति हमेशा मेरे लिए विषमय की स्थिति पैदा करती रही है।साथ में धर्म के साथ ही आसथा को जुड़ते हुए सुनता हूँ । कई सवाल मन को कुरेदते हैं । और कोई ऐसा अवसर नही मिला या आया कि मेरे प्रशनों सही सही जवाब मिल सके। धर्म तो समझना आसान है कयों कि ये हमारे समाज के कुछ लोगो में पुराने समय में कार्य के अुनुसार ही बना दिये थे । जिसका बिगड़ा हुआ रूप आज हम समाज में ऊच-नीच एवं भेदभाव के रूप में पाते हैं।
धर्म से जुढ़ा हुआ शब्द आस्था है, जिसका कि समाज के कुछ विशेष वर्ग लोग अपनी आवश्यकता और इच्छा के अनुसार लाभ उठाते हैं। भारतीय लोग धर्म को बहुत ज्यादा महत्व देते हैं जिससे उनकी आस्था का भी प्रश्न आता है ,तो ऐसे ईश्वर और भगवान को सामाजिक स्तर पर गुरूओं औरमठाधीशों ने अपने अनुसार अल्लेख किया है। मै इस बात पर नहीं जाना चाहता कि ईश्वर हैकि नहीं अन्यथा विषय बदल जायेगा।
भारतीय लोग बहुत भोले है यह बात सिध्ध है , किसी भी बात को बहुत जल्दी मान लेते हैं विश्वास कर लेते हैं। पर इस धर्म और आस्था के पीछे जो खेल होता है उससे वे अन्जान होते है। महागुरू, सतगुरू ,आचार्य इत्यादि पदवी धारक हमारे बीच है, हो सकता है आपमें कुछ उनके मानने वाले हो तो उनसे माफी चाहूँगा । कुछ समय पहले इलाहाबाद से बनारस जा रहे स्वामी जी को गोलियों सेभूना गया, वजह का पता अब तक न चल सका। और स्वामी जी के कार में केवल १९ वर्ष से २१ वर्षकी लड़कियां थी । जो नेपाल की थी।
ये संत , महात्मा समाज में ईश्वर को सहारा बना कर समाज में अनेक अपराध कर रहें है, और करते रहेगें क्यों कि हम इतने भोले जो है।
बाबा जी का शिविर लगता है तो इंटृी फीस तय की जाती है .आखिर बाबा जी को मोह माया से क्या मतलब ? लेकिन मतलब है, नहीं तो बाबा को महगी कार कहां से आयेगी?ऐशोआराम कहां से होगा? तमाम तरह के ऐसे मादक पदार्थ का सेवन होता है इन मठों में जो कि अववैध है पर कोई कुछ नही कर सकता । हम तो बस आखं मूद कर चलते हैं।। बाबा बनकर लोगो को लूटों कयोकि हम लुटाने को तैयार जो है।।।।

Tuesday, March 25, 2008

चोरी की सजा

बात कल शाम की करना चाहता हूँ. समय ७ बजे मार्केट में सामान लेने निकला था ,साथ में चाय की चुस्कियां भी लेनी भी वापस लौट रहा था तो गली से एक बच्चे के पीछे तीन बच्चे भाग रहे थे । मैने सोचा कि खेल रहे होगे क्योंकि बहुत ही गन्दे कपड़े थे .जिसके देख कर यही लगता था कि बहुत ही नीचे तबके के है । मैं जल्द ही वहां से अपने रूम पर आगया।
बाहर बालकनी में खड़ा था मैं और सड़क पर आते जाते लोगों को देख रहा था । जिस लड़के को मैंने गली में देखा था उसको पकड़ कर एक अंटी मार रही थी , मुझे देख कर यही समझ में आ रहा था कि वे सब लोग उस लड़के पर चोरी का इल्जाम लगा रही थी । कुछ चार पांच लोग काजमवाड़ा था, तभी एक अकल जी आये और बिना कुछ पूछे ही उस बच्चे को कई थप्पड़ जड दिये और वह फिर भाग गया। उसने चोरी की थी कि नही ये पता नहीं चला ?पर ये बात जरूर थी कि वह गरीब था ,यही उसकी लाचारी थी।
किसी को मारने का हक किसने दिया है उन महाशय को । अगर उसने चोरी की भी है तो यह सजा देने कौन होते है ? और क्या वह बच्चा इससे सुधर जायेगा ?।

एनकाउंटर

दिल्ली पुलिस के 'एनकांउटर विशेषज्ञ' माने जानेवाले एसीपी राजबीर सिंह की सोमवार रात दिल्ली से सटे हरियाणा के गुड़गाँव इलाक़े में गोली मारकर हत्या कर दी गई.वो दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा की स्पेशल ऑपरेशन टीम के प्रमुख थे.
राजबीर सिंह को एनकाउंटर विशेषज्ञों के रूप में जाना जाता था. उन्हें जेड प्लस सुरक्षा मिली हुई थी.
राजबीर सिंह गुडगाँव के एक प्रॉपर्टी डीलर के दफ़्तर में आए थे जहाँ उनकी गोली मार कर हत्या कर दी गई.
राजबीर सिंह 1982 में दिल्ली पुलिस में भर्ती हुए थे. उनका करियर उतार चढ़ाव भरा रहा.
उन्हें अनेक बार सम्मानित किया गया .
मुठभेड़ विशेषज्ञ राजबीर सिंह संसद और लाल किले पर हुए हमले की जाँच में भी शामिल थे
राजबीर सिंह अब तक 50 से अधिक मुठभेड़ों में शामिल रहे हैं.

कहानी कमली की ................

कमली आज बिल्कुल भी बोल नही रही थी कयों कि उसे मार पड़ी थी ,उसने घर का काम जो पूरा नही किया था।कमली के लिए ये कोई नयी बात नही थी , दिन या दो दिन में मार पड़ ही जाती थी बेचारी अपना गुस्सा चुप रहकर ही निकालती थी बिना किसी से बात किये हुए।
बचपन से ही अभागी रही थी , पैदा होते ही मां चल बसी और बाप का कुछ पता ही नही बचपन क्या होता है पता ही नही? रहने के लिए उसेमिला विशाल आकाश और खेलने के लिए प्रकृति की गोद। दुखमय जीवन में खुश रहने के सारे तरीके सीख लिये थे कमली ने।
हमेशा छोटी-२ बातों पर मुस्कुराती , सब की चहेती थी, पास की बुआ जी बहुत मानती थी कमली को। वैसे तो कपड़े और खाने की दिक्कत नही हुई पर प्यार नही मिला। इन सब बातों से परे हटकर कमली खुश थी। पढ़ाई का शौक था, पर उसकी चाची उसकी सबसे बड़ी दुश्मन थी, जानवरों जैसा वर्ताव था कमली के साथ, बात-बात पर पिटाई कर देती थी उसकी. इसीलिए आज भी घर का सारा काम न होने पर पिटाई की थी।
कमली को देखा नही था मैने ,केवल सुना था।
कमली को आज देखा मैने पर बात नहीं कर सकता था, वह सोचुकी थी गहरी नींद में हमेशा के लिएचल दी थीअनन्त यात्रा पर। मानों उपहास कर रही हो जमाने का किअब कौन छीन सकता है मेरी खुशी और मेरी हसी को?वह आजाद हो गई थी अपनी बेड़ियों कोतोड़ के वैसे भी उसकि हक नही था इस जहां में रहने का। जीवन के असीम आनंनद में कुछ भी नही था उसके लिए।
सफेद कफन सेढ़का उसका शरीर, और कफन के उपर कुछ गुड़हल और गेदें के फूलथे. शायद जिसके साथ वो कभी खेला करती रहीहोगी। वही साथ है उसके। पास बैठी कुछ औरतें और दूर पर शोर करते बच्चे।
कुछ देर तक मैं ररूका रहा उसके चेहरे को दखने के लिए। उसकी एक झलक पाने के लिए। काश कोई आये और उसके चेहरे से सफेद कफन को हटाये पर ऐसा नही हो रहा था। पेड़ की पत्तियों के बीच से सूरज की किरणें भी आज कमली को देखने के लिए व्याकुल थी. परेशान थी .पर वह तो चुपचाप सो रही थी किसी की परवाह किये बिना। ऐसे में हवा के एक झोके ने उसे जगाने का प्रयास किया था ,पर कमली तो न उठी पर उसके चेहरे से कफन जरूर हट गया था। कुछ देर तक मैं एकटक देखता रहाथा कमली को। कितनी मासूम ,कितनी भोली सूरत ।एकाएक मै उठकर चल दिया था वहां से दुख और ग्लानि लिये हुए मन म&